महंगी रासायनिक खाद और बढ़ती लागत से परेशान किसानों के लिए उत्तर प्रदेश के बहराइच से एक प्रेरक कहानी सामने आई है। यहां के किसान त्रिलोकी बिना यूरिया और रासायनिक खाद के, सिर्फ जीवामृत और घनजीवामृत के सहारे काला नमक धान की खेती कर रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक उनकी लागत एक एकड़ में महज 7 से 8 हजार रुपये के आसपास आती है।
घर की गाय से बनती है खाद
त्रिलोकी अपने घर की गाय-बछिया के गोबर और गोमूत्र से जीवामृत तैयार करते हैं। उन्होंने गोमूत्र इकट्ठा करने के लिए देसी जुगाड़ भी बनाया है, ताकि एक बूंद भी बेकार न जाए। इसी से तैयार जैविक घोल को वे खेत में डालते हैं। उनका कहना है कि इससे मिट्टी की सेहत सुधरती है और बाहर से खाद खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती।
जीवामृत कैसे बनता है
प्राकृतिक खेती में प्रचलित तरीके के अनुसार जीवामृत आमतौर पर इन चीजों से बनाया जाता है:
- देसी गाय का गोबर और गोमूत्र
- गुड़ और बेसन (या किसी दाल का आटा)
- खेत की मेड़ की थोड़ी सी मिट्टी
- पानी, जिसमें इस घोल को कुछ दिन छाया में सड़ने दिया जाता है
घनजीवामृत इसका सूखा रूप है, जिसे बुवाई के समय खेत में डाला जाता है।
काला नमक धान की खासियत
काला नमक चावल पूर्वी उत्तर प्रदेश की पहचान है और अपनी खुशबू व स्वाद के लिए मशहूर है। बाजार में इसकी कीमत सामान्य धान से ज्यादा मिलती है। त्रिलोकी K-13 किस्म उगा रहे हैं और उनके अनुसार एक एकड़ से 15-16 क्विंटल तक उपज की उम्मीद है। प्राकृतिक तरीके से उगाए गए चावल की मांग भी लगातार बढ़ रही है।
दूसरे किसानों के लिए सबक
त्रिलोकी की यह पहल दिखाती है कि देसी गाय और प्राकृतिक खेती के मेल से लागत घटाकर मुनाफा बढ़ाया जा सकता है। प्राकृतिक खेती अपनाने के इच्छुक किसान शुरुआत में छोटे हिस्से से प्रयोग करें और नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र या प्राकृतिक खेती मिशन से प्रशिक्षण जरूर लें।