शंकराचार्य से प्रमाण मांगना प्रशासन की सीमा से बाहर: उमा भारती का योगी सरकार पर तंज, समाधान की जताई उम्मीद

शंकराचार्य से प्रमाण मांगना प्रशासन की सीमा से बाहर: उमा भारती का योगी सरकार पर तंज, समाधान की जताई उम्मीद

प्रयागराज में 2026 माघ मेले के दौरान शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और उत्तर प्रदेश प्रशासन के बीच उपजा विवाद अब सियासी और धार्मिक बहस का बड़ा मुद्दा बनता जा रहा है। इस पूरे मामले में अब मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा की वरिष्ठ नेता उमा भारती ने खुलकर हस्तक्षेप किया है।

उमा भारती ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए प्रशासनिक कार्रवाई पर सवाल उठाए और इसे मर्यादाओं का उल्लंघन बताया। उन्होंने कहा कि शंकराचार्य होने का प्रमाण मांगना किसी भी प्रशासनिक अधिकारी के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता।

उमा भारती का स्पष्ट संदेश

अपने पोस्ट में उमा भारती ने लिखा कि उन्हें भरोसा है कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और उत्तर प्रदेश सरकार के बीच कोई संतुलित और सकारात्मक समाधान अवश्य निकलेगा, लेकिन जिस तरह से प्रशासन ने उनसे शंकराचार्य होने के सबूत मांगे, वह न केवल असंवेदनशील है बल्कि प्रशासनिक सीमाओं का भी अतिक्रमण है।

उनके अनुसार, यह अधिकार केवल शंकराचार्य परंपरा और विद्वत परिषद को है, न कि सरकार या नौकरशाही को।

उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को टैग करते हुए यह भी संकेत दिया कि ऐसे मामलों में धार्मिक परंपराओं की गरिमा और सम्मान बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है।

विवाद की शुरुआत कैसे हुई

यह पूरा विवाद 17 जनवरी को माघ मेले के दौरान मौनी अमावस्या के दिन सामने आया, जब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद संगम स्नान के लिए पहुंचे थे। प्रशासन द्वारा उनके रथ और पालकी से जुड़ी व्यवस्थाओं पर लगाए गए प्रतिबंधों को लेकर तनाव बढ़ा, जिसके बाद मामला तूल पकड़ गया।

इसके बाद प्रशासन ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को ‘शंकराचार्य’ उपाधि के प्रयोग को लेकर नोटिस जारी किया। प्रशासन का तर्क था कि सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के अनुसार, विवाद लंबित रहने की स्थिति में इस उपाधि का प्रयोग प्रतिबंधित है।

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का पक्ष

नोटिस के जवाब में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि शंकराचार्य वही होता है जिसे अन्य पीठों के शंकराचार्य मान्यता देते हैं। उन्होंने दावा किया कि उन्हें द्वारका और श्रृंगेरी पीठ के शंकराचार्यों का सम्मान और समर्थन प्राप्त है।

राजनीतिक हलकों में बढ़ी हलचल

उमा भारती के बयान के बाद यह मुद्दा राजनीतिक गलियारों में भी गूंजने लगा है। भाजपा के भीतर ही इस विषय पर मतभेद दिखाई देने लगे हैं—कुछ नेता प्रशासनिक कार्रवाई को सही ठहरा रहे हैं, तो कुछ धर्म और परंपरा के आधार पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के समर्थन में खड़े नजर आ रहे हैं।

विपक्षी दलों ने भी सरकार पर हमला बोलते हुए धार्मिक मामलों में संवेदनहीनता का आरोप लगाया है।

धरना-प्रदर्शन और बढ़ता दबाव

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के समर्थक लगातार धरना और प्रदर्शन कर रहे हैं। उनकी मांग है कि शंकराचार्य को सम्मानपूर्वक संगम स्नान का अधिकार दिया जाए। साथ ही कुछ प्रशासनिक अधिकारियों की भूमिका को लेकर जवाबदेही और इस्तीफे तक की मांग उठने लगी है।