नई दिल्ली : देश की यूनिवर्सिटी खेल व्यवस्था इन दिनों गंभीर बहस के केंद्र में है। दशकों से खेल उत्कृष्टता की पहचान रही मौलाना अबुल कलाम आज़ाद (MAKA) ट्रॉफी और खेलो इंडिया यूनिवर्सिटी गेम्स (KIUG) को लेकर कई अहम सवाल उठ रहे हैं। आरोप हैं कि हालिया वर्षों में किए गए नियमों के बदलावों ने प्रतियोगिता की निष्पक्षता को प्रभावित किया है और कुछ चुनिंदा संस्थानों को असमान लाभ पहुंचाया गया है।
पूरे साल के प्रदर्शन से हटकर अचानक बदले नियम
करीब 65 वर्षों से MAKA ट्रॉफी का मूल्यांकन पूरे खेल सत्र में विश्वविद्यालयों के निरंतर प्रदर्शन के आधार पर किया जाता रहा है। इसमें अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताएं, AIU चैंपियनशिप और विभिन्न राष्ट्रीय स्तर के टूर्नामेंट शामिल होते थे।
लेकिन 2023–24 के सत्र में, खेल सत्र समाप्त होने के बाद नियमों में ऐसा बदलाव किया गया, जिसने पूरी मूल्यांकन प्रणाली की दिशा ही बदल दी।
जहां पहले KIUG का वेटेज सीमित था, वहीं इसे पीछे की तारीख से लगभग पूर्ण प्रभावी बना दिया गया। इसका परिणाम यह हुआ कि साल भर का प्रदर्शन लगभग अप्रासंगिक हो गया और ट्रॉफी का फैसला कुछ गिने-चुने आयोजनों पर निर्भर हो गया।
मेडल ग्राफ में असामान्य उछाल
नियमों में बदलाव के बाद एक निजी यूनिवर्सिटी के प्रदर्शन में अचानक बड़ा उछाल देखने को मिला। पहले जहां इस यूनिवर्सिटी के मेडल बेहद सीमित थे, वहीं एक ही सत्र में मेडल संख्या कई गुना बढ़ गई।
इस अप्रत्याशित वृद्धि ने अन्य सरकारी विश्वविद्यालयों, विशेषकर पंजाब की यूनिवर्सिटीज़, को पीछे छोड़ दिया और विवाद को जन्म दिया।
नए खेल, ज्यादा इवेंट और संसाधनों की असमानता
2024–25 के सत्र में विवाद और गहरा गया जब कैनोइंग और कयाकिंग जैसे खेलों को खेलो इंडिया यूनिवर्सिटी गेम्स में शामिल किया गया। ये फैसले ऐसे समय लिए गए जब अधिकांश विश्वविद्यालय अपने बजट और प्रशिक्षण योजनाएं पहले ही तय कर चुके थे।
आरोप है कि इन खेलों में इवेंट्स की संख्या अंतरराष्ट्रीय मानकों से कहीं अधिक रखी गई, जिनमें कई नॉन-ओलंपिक श्रेणियां भी शामिल थीं। चूंकि ये खेल महंगे इंफ्रास्ट्रक्चर और विशेष संसाधनों की मांग करते हैं, इसलिए अधिकांश पब्लिक यूनिवर्सिटीज़ इनके लिए तैयार नहीं थीं।
खिलाड़ियों की एंट्री और पारदर्शिता पर भी सवाल
मामले को और गंभीर बनाते हैं खिलाड़ियों की पात्रता से जुड़े आरोप। कुछ मामलों में यह दावा किया जा रहा है कि तय समय सीमा के बाद भी खिलाड़ियों को प्रतियोगिता में भाग लेने की अनुमति दी गई, जबकि उनके नाम आधिकारिक सूची में स्वीकृत नहीं थे। नियमों के उल्लंघन के इन आरोपों ने पूरे आयोजन की पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
सरकारी फंडिंग और निष्पक्षता की बहस
खेल विशेषज्ञों का कहना है कि जब किसी राष्ट्रीय खेल आयोजन में सरकारी धन का उपयोग होता है, तो नियमों की निष्पक्षता और समान अवसर सुनिश्चित करना अनिवार्य हो जाता है। यदि नियम ऐसे बनाए जाएं जो संसाधन-संपन्न संस्थानों को ही लाभ पहुंचाएं, तो खेलों का मूल उद्देश्य ही प्रभावित होता है।
गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी की औपचारिक शिकायत
पंजाब की प्रमुख सरकारी संस्था गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी ने इन बदलावों को लेकर औपचारिक आपत्ति दर्ज कराई है और निष्पक्ष जांच की मांग की है। यूनिवर्सिटी का कहना है कि यदि इसी तरह नियम बदले जाते रहे, तो न केवल MAKA ट्रॉफी की गरिमा प्रभावित होगी, बल्कि यूनिवर्सिटी खेलों की विश्वसनीयता भी खतरे में पड़ जाएगी।
अब फैसला केंद्र के हाथ में
अब निगाहें युवा मामले एवं खेल मंत्रालय और स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया पर टिकी हैं। सवाल यह है कि क्या इन आरोपों की स्वतंत्र और पारदर्शी जांच होगी, या फिर यह मामला भी अन्य विवादों की तरह समय के साथ दबा दिया जाएगा।