नई दिल्ली: 1947 तक हमारा देश अंग्रेजों का गुलाम था, लेकिन आज का कड़वा सच यह है कि पूरा देश अंग्रेजी दवाओं का गुलाम बन चुका है। मुख्यधारा का मीडिया (Mainstream Media) जिस सच को विज्ञापनों के दबाव में अक्सर दबा देता है, 'द जगरण न्यूज़' आज उस छिपे हुए सच को सार्वजनिक करने जा रहा है। सोशल मीडिया पर छिड़े 'हेल्थ इन्फ्लुएंसर्स बनाम वैकल्पिक चिकित्सा' के इस महायुद्ध के बीच, विख्यात चिकित्सा शोधकर्ता डॉ. बिश्वरूप रॉय चौधरी (Dr. Biswaroop Roy Chowdhury) ने एलोपैथी के संपूर्ण साम्राज्य को एक ऐसी चुनौती दी है, जिसने मेडिकल काउंसिल से लेकर फार्मास्यूटिकल लॉबी तक को हिलाकर रख दिया है।
हाल ही में सोशल मीडिया पर कुछ तथाकथित विशेषज्ञों द्वारा डॉ. बिश्वरूप की मानद (Honorary) पीएचडी डिग्री और उनके आविष्कारों पर सवाल उठाने की नाकाम कोशिश की गई। स्क्रीन के पीछे छुपकर वार करने वाले इन आलोचकों को डॉ. चौधरी ने न केवल उनके झूठ का आईना दिखाया है, बल्कि ₹10 लाख की भारी-भरकम राशि का एक ऐसा खुला चैलेंज दे दिया है, जिस पर पूरी एलोपैथी बिरादरी ने रहस्यमयी चुप्पी साध ली है।
₹10 लाख का महा-चैलेंज: "साबित करो कि एलोपैथी से 1% भी ठीक होती है बीमारी"
डॉ. बिश्वरूप रॉय चौधरी ने अपने आधिकारिक प्लेटफॉर्म से एलोपैथी की पूरी लॉबी को सीधे शब्दों में ललकारा है। उन्होंने कहा:
"मैने एक चैलेंज रखा है और इसे रखे हुए भी कुछ साल हो गए कि जो भी यह साबित कर देगा कि एलोपैथी की कोई भी एक दवाई से कोई भी एक बीमारी 1% भी अगर ठीक होती हो, तो मैं उसे अपनी जेब से ₹10 लाख नकद दे दूंगा। एलोपैथी में इलाज के नाम पर कुछ है ही नहीं।"
उनका गणितीय और तार्किक दावा है कि एलोपैथी के पास सिर्फ लक्षणों को दबाने और मरीज को ताउम्र दवाओं का गुलाम बनाए रखने का तंत्र है। उनके द्वारा आविष्कृत DIP डाइट के माध्यम से पिछले 15 वर्षों में डायबिटीज, बीपी और हार्ट के मरीजों की दवाएं मात्र दो से तीन दिनों में छूट जाती हैं और ब्लड शुगर सामान्य होने लगता है। उन्होंने चुनौती दी है कि यदि एलोपैथी दवाओं में दम है, तो वे ऐसा कोई मेडिकल लिटरेचर या सबूत पेश करें जिससे साबित हो कि दवाएं खाने वाले मरीजों की उम्र लंबी हुई हो या उनकी जीवन की गुणवत्ता (Quality of Life) बेहतर हुई हो।
डिग्री और किताबों का सच: ₹1 लाख का एक और इनाम
डॉ. बिश्वरूप के अनुसार, उनकी वेबसाइट (biswaroop.com) पर उनके रिसर्च-बेस्ड डॉक्टरेट के सभी प्रामाणिक दस्तावेज सार्वजनिक हैं। इतना ही नहीं, उन्होंने अपने हर आविष्कार को एविडेंस-बेस्ड (प्रमाण-आधारित) किताबों के रूप में दर्ज किया है:
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एचआईवी/एड्स का सच: डॉ. बिश्वरूप ने अपनी 2018 की चर्चित पुस्तक "HIV AIDS: The Greatest Lie of 21st Century" का हवाला देते हुए कहा कि यदि इस किताब के एक भी सबूत को कोई गलत साबित कर दे, तो वे उसे ₹1 लाख का अतिरिक्त इनाम देंगे। यह किताब ऑनलाइन मुफ्त में उपलब्ध है, लेकिन आज तक किसी डॉक्टर ने इसके पन्नों को चुनौती देने की हिम्मत नहीं दिखाई।
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बायोप्सी और मेमोग्राफी का खतरा: अपनी पुस्तक "Rabbit Tortoise Network for Cancer Cure" में उन्होंने स्थापित किया है कि मेमोग्राम के दौरान जब 22 किलो की दो प्लेट्स ब्रेस्ट को दबाती हैं, तो अंदरूनी सेल्स टूट जाते हैं और यही इंजरी असली कैंसर को जन्म देती है। इसी तरह बायोप्सी भी कैंसर को शरीर में फैलाती है।
वैक्सीन और ऑटिज्म (Autism) का भयावह खेल
डॉ. बिश्वरूप ने बच्चों को दी जाने वाली वैक्सीन के पीछे के वैश्विक खेल का भी पर्दाफाश किया है। उन्होंने अपनी पुस्तक "ऑटिज्म से आजादी" का संदर्भ देते हुए कई चौंकाने वाले वैज्ञानिक तथ्य सामने रखे:
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वैक्सिनेटेड बनाम अनवैक्सिनेटेड पॉपुलेशन: दुनिया भर में हुई तुलनात्मक स्टडीज से साफ हुआ है कि जिन 10% बच्चों को स्वेच्छा से कोई वैक्सीन नहीं दी गई, उनमें ऑटिज्म, एडीएचडी (ADHD), डायबिटीज और न्यूरो-डेवलपमेंटल डिसऑर्डर शून्य प्रतिशत हैं।
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बढ़ती वैक्सीन, बढ़ती बीमारियां: हमारे बचपन में जहां 3-4 वैक्सीन लगती थीं, आज बच्चों को 30 से 40 वैक्सीन थोपी जा रही हैं। यही कारण है कि आज अमेरिका में हर 12 में से 1 बच्चा और भारत में हर 100 में से 1 बच्चा ऑटिज्म जैसी भयानक स्थिति से जूझ रहा है। यहाँ तक कि अमेरिकी मंचों पर भी अब यह स्वीकार किया जा रहा है कि यह पूरा खेल सिर्फ फार्मा कंपनियों के मुनाफे के लिए खेला जा रहा है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जैसे दिग्गजों ने भी सार्वजनिक मंचों से यह स्वीकार किया था कि बच्चों में बढ़ता ऑटिज्म और एडीएचडी कहीं न कहीं इस भारी-भरकम वैक्सीनेशन के खेल का नतीजा है।
महामारी के प्रोपेगैंडा और कृत्रिम किल्लत का पर्दाफाश
डॉ. बिश्वरूप ने मुख्यधारा के मीडिया द्वारा फैलाए जा रहे वायरस के सालाना चक्रव्यूह पर भी तीखा प्रहार किया। उन्होंने याद दिलाया कि कैसे हर साल एक नया नाम—चाहे वह मंकीपॉक्स हो, एचएमपीवी हो, डेल्टा वेरिएंट हो, या वर्तमान में चल रहा नीपा (Nipah) का खेल हो—मार्केट में उतारा जाता है।
कोरोना काल का कड़वा सच: डॉ. चौधरी ने दावा किया कि महामारी के दौरान अस्पतालों में रेमडेसिविर जैसे जहर देकर मरीजों को मारा गया। मौत दवाओं के साइड इफेक्ट से हुई, लेकिन नाम वायरस का दे दिया गया। सच छुपाने के लिए शवों की ऑटोप्सी (पोस्टमार्टम) तक नहीं होने दी गई, जबकि कक्षा 8 का विज्ञान भी जानता है कि एक मृत शरीर न तो सांस ले सकता है और न बोल सकता है, इसलिए वह कोई वायरस नहीं फैला सकता। ऑक्सीमीटर के जरिए 'हैप्पी हाइपोक्सिया' का कृत्रिम डर पैदा करके देश में बेड और ऑक्सीजन सिलेंडरों की ब्लैक मार्केटिंग का जो खेल रचा गया, उसके सारे सबूत उनकी 2000 पन्नों की मुफ्त पुस्तक "Vaccinated to Death" में दर्ज हैं।