ए.आर. रहमान के बयान पर संत समाज में नाराज़गी, धीरेंद्र शास्त्री ने साधा तीखा निशाना

ए.आर. रहमान के बयान पर संत समाज में नाराज़गी, धीरेंद्र शास्त्री ने साधा तीखा निशाना

नई दिल्ली/छतरपुर: ऑस्कर विजेता संगीतकार ए.आर. रहमान के हालिया बयान ने सियासी और धार्मिक हलकों में बहस छेड़ दी है। एक इंटरव्यू में हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में कथित सांप्रदायिकता का जिक्र करते हुए काम मिलने में परेशानी की बात कहने पर कई साधु-संतों ने कड़ा ऐतराज जताया है।

बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर पंडित धीरेंद्र शास्त्री ने इस मुद्दे पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि भारत में तथाकथित सेक्युलर सोच के नाम पर सांस्कृतिक मूल्यों को कमजोर किया जा रहा है। उन्होंने शिक्षा पद्धति का उदाहरण देते हुए कहा कि पहले बच्चों को “ग से गणेश” सिखाया जाता था, लेकिन बाद में इसे संप्रदायिक बताकर हटाया गया, जिसका असर समाज पर पड़ा है।

धीरेंद्र शास्त्री ने वैदिक परंपराओं की वकालत करते हुए कहा कि यदि भारत को अपनी सांस्कृतिक पहचान के साथ आगे बढ़ाना है तो हर जिले में वैदिक गुरुकुल स्थापित किए जाने चाहिए। उन्होंने जनसंख्या और सामाजिक संतुलन से जुड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि हिंदू समाज को अपनी जनसंख्या घटाने के बजाय बढ़ाने पर विचार करना चाहिए, ताकि जल, जंगल, जमीन और परिवार की रक्षा की जा सके।

वहीं इस पूरे विवाद पर अलग-अलग धार्मिक और राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी सामने आई हैं। सिद्ध पीठ हनुमानगढ़ी के देवेशाचार्य महाराज ने कहा कि ए.आर. रहमान एक प्रतिष्ठित और विश्वविख्यात कलाकार हैं और इस तरह के बयान या आरोप किसी भी पक्ष द्वारा नहीं लगाए जाने चाहिए।

राजनीतिक प्रतिक्रिया में समाजवादी पार्टी नेता एस.टी. हसन ने कहा कि रहमान ने केवल अपनी चिंता व्यक्त की है और देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर माहौल ठीक नहीं है। कांग्रेस विधायक अमीन पटेल ने भी बयान के संदर्भ को समझने की बात कही और कहा कि बिना पूरी जानकारी के निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।

वहीं अखिल भारतीय मुस्लिम जमात के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना शहाबुद्दीन रजवी ने कहा कि ए.आर. रहमान भारत ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सम्मानित कलाकार हैं। यदि उन्हें अपने नाम या पहचान के कारण किसी तरह की पेशेवर परेशानी का सामना करना पड़ रहा है, तो इसे उनकी व्यक्तिगत अनुभूति के रूप में देखा जाना चाहिए।

ए.आर. रहमान के बयान को लेकर जारी यह बहस अब केवल फिल्म इंडस्ट्री तक सीमित नहीं रही, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक विमर्श का विषय बन गई है।