एक देश-एक चुनाव 2029 से लागू हो सकता है, संयुक्त संसदीय समिति ने दिए संकेत

एक देश-एक चुनाव 2029 से लागू हो सकता है, संयुक्त संसदीय समिति ने दिए संकेत

नई दिल्ली, 11 जुलाई 2026। देश में लंबे समय से चर्चा में रहे "एक देश-एक चुनाव" (One Nation, One Election) प्रस्ताव को लेकर बड़ा अपडेट सामने आया है। संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के अध्यक्ष पी.पी. चौधरी ने संकेत दिए हैं कि आवश्यक कानूनी और प्रक्रियात्मक तैयारियां पूरी होने के बाद वर्ष 2029 के लोकसभा चुनाव तक इस व्यवस्था को लागू किया जा सकता है।

इस प्रस्ताव का उद्देश्य लोकसभा और सभी राज्यों की विधानसभा के चुनाव एक साथ कराना है, जिससे चुनावी खर्च कम हो, प्रशासनिक संसाधनों का बेहतर उपयोग हो और बार-बार लागू होने वाली आचार संहिता से विकास कार्य प्रभावित न हों।

क्या है एक देश-एक चुनाव?

वर्तमान व्यवस्था में लोकसभा और विभिन्न राज्यों की विधानसभा चुनाव अलग-अलग समय पर होते हैं। इसके कारण लगभग हर वर्ष देश के किसी न किसी हिस्से में चुनावी गतिविधियां चलती रहती हैं। प्रस्तावित व्यवस्था के तहत लोकसभा और विधानसभा चुनावों को एक ही चक्र में लाने का प्रयास किया जा रहा है।

भारत में 1952 से 1967 तक अधिकांश चुनाव एक साथ होते थे, लेकिन बाद में विभिन्न विधानसभाओं के समय से पहले भंग होने और राजनीतिक परिस्थितियों के कारण यह व्यवस्था टूट गई।

समिति ने क्या कहा?

संयुक्त संसदीय समिति के अध्यक्ष पी.पी. चौधरी के अनुसार समिति तेजी से कार्य कर रही है और लक्ष्य है कि 2029 तक इस मॉडल को लागू करने के लिए आवश्यक ढांचा तैयार हो जाए। उन्होंने कहा कि चुनावी सुधारों की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।

समिति संविधान (129वां संशोधन) विधेयक, 2024 और अन्य संबंधित प्रावधानों की समीक्षा कर रही है, जिनका उद्देश्य लोकसभा और विधानसभा चुनावों को एक साथ कराने के लिए कानूनी आधार तैयार करना है।

क्या होंगे फायदे?

विशेषज्ञों और समर्थकों का मानना है कि एक साथ चुनाव होने से:

  • चुनावी खर्च में बड़ी कमी आएगी।
  • सुरक्षा बलों की बार-बार तैनाती की आवश्यकता घटेगी।
  • बार-बार लागू होने वाली आचार संहिता से विकास कार्य प्रभावित नहीं होंगे।
  • सरकारी मशीनरी शासन और विकास कार्यों पर अधिक ध्यान दे सकेगी।
  • राजनीतिक दलों और प्रशासन का समय और संसाधन बचेंगे।

क्या हैं चुनौतियां?

हालांकि इस प्रस्ताव का विरोध करने वाले दल और विशेषज्ञ कुछ चिंताएं भी जता रहे हैं। उनका कहना है कि:

  • क्षेत्रीय और स्थानीय मुद्दे राष्ट्रीय मुद्दों के सामने दब सकते हैं।
  • संघीय ढांचे पर असर पड़ सकता है।
  • यदि कोई सरकार समय से पहले गिर जाती है तो चुनावी चक्र बनाए रखना चुनौतीपूर्ण होगा।
  • संविधान में कई संशोधनों की आवश्यकता पड़ेगी।

आगे क्या होगा?

इस प्रस्ताव को लागू करने के लिए संविधान में संशोधन और कई चुनावी कानूनों में बदलाव आवश्यक होंगे। इसके अलावा संसद और राज्यों की सहमति भी महत्वपूर्ण होगी। यदि सभी प्रक्रियाएं समय पर पूरी हो जाती हैं तो वर्ष 2029 भारत के चुनावी इतिहास में एक बड़ा बदलाव लेकर आ सकता है।