महिला कानूनों के दुरुपयोग पर प्रेमानंद महाराज की दो टूक, बोले– संरक्षण के नाम पर शोषण अधर्म

महिला कानूनों के दुरुपयोग पर प्रेमानंद महाराज की दो टूक, बोले– संरक्षण के नाम पर शोषण अधर्म

वृंदावन।

वृंदावन के प्रसिद्ध संत श्रीहित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज ने महिलाओं की सुरक्षा के लिए बने कानूनों के गलत इस्तेमाल को लेकर समाज को चेताया है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि कानून पीड़ितों की रक्षा के लिए होता है, न कि किसी निर्दोष व्यक्ति को प्रताड़ित करने या धन उगाही का माध्यम बनाने के लिए।

श्रीहित राधा केलीकुंज आश्रम में एक भक्त के प्रश्न का उत्तर देते हुए प्रेमानंद महाराज ने वर्तमान सामाजिक हालात और पारिवारिक टूटन पर गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि यदि कानून की आड़ लेकर किसी निर्दोष पर अत्याचार किया जाता है, तो वह अधर्म की श्रेणी में आता है और उसका दंड ईश्वर स्वयं देता है।

अतीत की पीड़ा से बने कड़े कानून

प्रेमानंद महाराज ने स्वीकार किया कि इतिहास में महिलाओं पर हुए अमानवीय अत्याचारों के कारण ही सरकार को कठोर कानून बनाने पड़े। उन्होंने एक हृदयविदारक घटना का उल्लेख करते हुए बताया कि किस तरह दहेज के लिए एक बेटी को चारपाई से बांधकर जला दिया गया था। ऐसे ही जघन्य अपराधों ने समाज को झकझोरा और महिलाओं की सुरक्षा के लिए सख्त कानूनों की आवश्यकता पड़ी।

झूठे मुकदमों पर सख्त चेतावनी

हालांकि संत प्रेमानंद महाराज ने यह भी कहा कि वर्तमान समय में कुछ लोग इन कानूनों का दुरुपयोग कर रहे हैं। उन्होंने चिंता जताई कि कहीं-कहीं परिवार जानबूझकर अपनी बेटियों का साथ देकर निर्दोष पुरुषों और उनके परिवारों से धन वसूलने का प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने इसे सीधा-सीधा अधर्म बताया।

पश्चिमी प्रभाव से बिगड़ते रिश्ते

संत प्रेमानंद महाराज ने समाज में बढ़ते तलाक, पारिवारिक कलह और कटुता के पीछे पाश्चात्य संस्कृति के अंधानुकरण को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा कि कम उम्र में संयम खोना, बॉयफ्रेंड-गर्लफ्रेंड की संस्कृति और लिव-इन रिलेशनशिप जैसी प्रवृत्तियां भारतीय पारिवारिक व्यवस्था को कमजोर कर रही हैं।

सुखी दांपत्य का बताया मार्ग

प्रवचन के अंत में प्रेमानंद महाराज ने समाधान देते हुए कहा कि पति-पत्नी को एक-दूसरे के प्रति समर्पण, विश्वास और मित्रता का भाव रखना चाहिए। उन्होंने पीड़ित पुरुषों से धैर्य रखने और ईश्वर पर विश्वास बनाए रखने की अपील की। महाराज ने कहा कि यदि समाज धर्म और नैतिकता के मार्ग पर चले, तो कानूनी संघर्षों की जरूरत ही नहीं पड़ेगी।