वृंदावन के प्रसिद्ध संत श्रीहित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के आश्रम में हाल ही में 2024 बैच के नवनियुक्त भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) अधिकारियों ने दर्शन कर आध्यात्मिक मार्गदर्शन प्राप्त किया। इस समूह में बैच की टॉपर शक्ति दुबे भी शामिल रहीं। अधिकारियों ने अपने प्रशासनिक जीवन की शुरुआत से पहले संत से यह जानना चाहा कि वे किस प्रकार देश की सेवा ईमानदारी और निष्ठा के साथ कर सकें।
श्रीहित राधा केलीकुंज आश्रम में हुए इस संवाद के दौरान प्रेमानंद महाराज ने प्रशासन और धर्म के बीच संतुलन पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भय और प्रलोभन ही ऐसे दो कारण हैं, जो व्यक्ति को अपने कर्तव्य पथ से विचलित कर देते हैं। यदि अधिकारी इन दोनों से ऊपर उठकर निर्णय लें, तो शासन व्यवस्था स्वतः न्यायपूर्ण बन सकती है।
गीता से मिला प्रशासन का दर्शन
प्रेमानंद महाराज ने नवप्रशिक्षु अधिकारियों को भगवद्गीता के प्रसंगों से शासन का मर्म समझाया। उन्होंने कहा कि जैसे महाभारत में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कर्तव्य पालन का संदेश दिया, वैसे ही प्रत्येक अधिकारी को अपने पद को ईश्वर प्रदत्त जिम्मेदारी मानकर निभाना चाहिए। पद का प्रयोग निजी स्वार्थ या लालच के लिए करना धर्मविरुद्ध है।
गलत फैसले का भार अंततः स्वयं पर
संत ने कहा कि यदि कोई अधिकारी लालच में आकर निर्दोष को दंडित करता है और दोषी को संरक्षण देता है, तो भले ही समाज उस कृत्य को न देख पाए, लेकिन ईश्वर सब जानता है। ऐसे कर्मों का फल व्यक्ति को अवश्य भोगना पड़ता है।
सादगी और संतोष से होगी सच्ची सेवा
प्रेमानंद महाराज ने अधिकारियों को सादगी, संयम और ईश्वर स्मरण को जीवन का आधार बनाने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि साधारण जीवन, सीमित आवश्यकताओं और धर्म के मार्ग पर चलते हुए किया गया कार्य ही सच्ची राष्ट्रसेवा है। उन्होंने अधिकारियों को आशीर्वाद देते हुए कहा कि यदि सोच पवित्र हो, तो शासन भी जनकल्याणकारी बन जाता है।