विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा रोक लगाए जाने के बाद उत्तर प्रदेश में राजनीतिक, सामाजिक और शैक्षणिक हलकों में तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। कोर्ट के फैसले के बाद कई जिलों में जहां छात्रों और सामाजिक संगठनों ने राहत की सांस ली, वहीं जगह-जगह जश्न और प्रदर्शन भी हुए।
आगरा, बरेली, मेरठ, गोंडा, बुलंदशहर, अमेठी, महोबा, ललितपुर और मिर्जापुर सहित कई जिलों में UGC नियमों के विरोध में लंबे समय से चल रहे आंदोलनों को अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले से मजबूती मिली है। विभिन्न विश्वविद्यालयों और कॉलेज परिसरों में छात्रों ने इसे अपनी लड़ाई की जीत बताया।
साधु-संतों ने भी फैसले का किया स्वागत
प्रयागराज में माघ मेले के दौरान मौजूद साधु-संतों ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का स्वागत किया। श्रृंगवेरपुर पीठाधीश्वर श्रीमद् जगतगुरु रामानुजाचार्य स्वामी नारायणाचार्य शांडिल्य जी महाराज ने कहा कि UGC का नया बिल समाज में विभाजन पैदा करने वाला था। उन्होंने इसे “काला कानून” बताते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से इसे पूरी तरह समाप्त करने की मांग की। इससे पहले साधु-संत गंगा तट पर कैंडल जलाकर इस कानून के विरोध में प्रदर्शन भी कर चुके थे।
छात्रों और सामाजिक संगठनों में खुशी
लखनऊ विश्वविद्यालय समेत कई शिक्षण संस्थानों में छात्रों ने एक-दूसरे को मिठाई खिलाकर खुशी जाहिर की। मिर्जापुर में करणी सेना और स्वर्ण आर्मी के कार्यकर्ताओं ने कलेक्ट्रेट परिसर में आतिशबाजी कर जश्न मनाया। अमेठी और महोबा में सवर्ण समाज के लोगों ने इसे अपने अधिकारों की रक्षा से जुड़ा फैसला बताया।
राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी तेज
UGC नियमों पर रोक को लेकर पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह ने सुप्रीम कोर्ट की सराहना करते हुए कहा कि यदि यह कानून लागू होता तो समाज का ताना-बाना बिगड़ सकता था। वहीं उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने कहा कि देश की सर्वोच्च अदालत का आदेश सभी को स्वीकार्य है।
कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अजय राय ने भी फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि ऐसा कानून नहीं होना चाहिए जो समाज में असमानता बढ़ाए।
विरोध की बड़ी वजह क्या है?
UGC ने वर्ष 2026 में Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026 लागू किए थे, जिनका उद्देश्य विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में जातिगत भेदभाव रोकना बताया गया। इसके तहत हर संस्थान में इक्विटी कमेटी बनाने का प्रावधान है, जिसमें SC, ST, OBC, महिला और दिव्यांग प्रतिनिधि शामिल होंगे।
हालांकि, सामान्य वर्ग के छात्रों और संगठनों का आरोप है कि इन नियमों में जनरल कैटेगरी को भेदभाव का शिकार मानने का कोई प्रावधान नहीं है। उनका कहना है कि इससे झूठी शिकायतों का खतरा बढ़ सकता है और नए तरह का भेदभाव जन्म ले सकता है। इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दाखिल की गई थीं।
सुप्रीम कोर्ट का रुख
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रथम दृष्टया नियमों की भाषा स्पष्ट नहीं है और इसके दुरुपयोग की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने केंद्र सरकार से नियमों की दोबारा समीक्षा करने को कहा है। तब तक वर्ष 2012 के पुराने नियम ही लागू रहेंगे। मामले की अगली सुनवाई 19 मार्च को होगी।