भारत में हिंदू पर्वों की उपेक्षा पर सवाल, पश्चिमी संस्कृति के बढ़ते प्रभाव को लेकर चिंता

भारत में हिंदू पर्वों की उपेक्षा पर सवाल, पश्चिमी संस्कृति के बढ़ते प्रभाव को लेकर चिंता

भारत को सनातन संस्कृति की भूमि कहा जाता है, जहां बहुसंख्यक आबादी हिंदू धर्म को मानने वाली है। इसके बावजूद हाल के वर्षों में यह सवाल लगातार उठता रहा है कि देश में हिंदू पर्व-त्योहारों की पहचान और शास्त्रीय परंपराएं क्यों कमजोर होती जा रही हैं, जबकि मुस्लिम और ईसाई त्योहारों का सामाजिक, सांस्कृतिक और सरकारी स्तर पर प्रभाव लगातार बढ़ रहा है।

विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि हिंदू पर्वों को या तो सीमित दायरे में समेट दिया गया है या फिर उनके मूल शास्त्रीय स्वरूप में बदलाव कर उन्हें आधुनिक और विकृत रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। इसके विपरीत, 25 दिसंबर को मनाया जाने वाला क्रिसमस डे देशभर में सरकारी अवकाश के साथ व्यापक रूप से मनाया जाता है, जबकि ईसाई समुदाय की जनसंख्या देश में अल्पसंख्यक है।

आलोचकों का दावा है कि 25 दिसंबर से 1 जनवरी तक चलने वाले पश्चिमी नववर्ष और उत्सवों के दौरान देश में बड़े पैमाने पर शराब की बिक्री, मांसाहार और पशु वध होता है। इन कुछ दिनों में करोड़ों रुपये का कारोबार होता है और आर्थिक रूप से सबसे अधिक भार आम हिंदू परिवारों पर पड़ता है। उनका कहना है कि हिंदू शास्त्रों में न तो वर्ष के अंत को लेकर और न ही 1 जनवरी को नए वर्ष के रूप में मनाने का कोई उल्लेख मिलता है।

इस पूरे विषय में तुलसी पूजन दिवस का मुद्दा भी बार-बार उठाया जा रहा है। कुछ संतों और संगठनों का कहना है कि 25 दिसंबर को तुलसी पूजन दिवस के रूप में मनाने की शुरुआत एक संत द्वारा की गई थी, लेकिन बाद में उन्हें विवादों में घेरकर जेल भेज दिया गया। समर्थकों का आरोप है कि इस पूरे प्रकरण में साजिश के तहत उस पहल को दबाया गया, जबकि समाज का एक बड़ा वर्ग बिना तथ्यों की पड़ताल किए उस संत को दोषी मान बैठा।

इन घटनाक्रमों को लेकर यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या यह भारत की सनातन संस्कृति को कमजोर करने की सुनियोजित कोशिश है। आलोचक मीडिया, सरकारी तंत्र और न्यायपालिका की भूमिका पर भी सवाल खड़े कर रहे हैं और आरोप लगा रहे हैं कि बाहरी संस्कृतियों को बढ़ावा देने में ये संस्थाएं भी अप्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदार हैं।

हालांकि दूसरी ओर कुछ बुद्धिजीवियों का मानना है कि भारत की पहचान उसकी विविधता और सभी धर्मों के सहअस्तित्व में है, लेकिन वे यह भी स्वीकार करते हैं कि बहुसंख्यक समाज की सांस्कृतिक परंपराओं की अनदेखी चिंता का विषय है।

फिलहाल यह मुद्दा देश में संस्कृति, परंपरा और आधुनिक प्रभावों के टकराव को लेकर एक नई बहस को जन्म दे रहा है। सवाल यह है कि क्या भारत अपनी सनातन विरासत को संरक्षित रख पाएगा, या फिर समय के साथ उसकी पहचान धुंधली होती चली जाएगी।