रक्षाबंधन: जानिए कलाई पर बंधे धागे का विज्ञान और इतिहास

रक्षाबंधन: जानिए कलाई पर बंधे धागे का विज्ञान और इतिहास

रक्षाबंधन: सिर्फ भाई-बहन का पर्व नहीं, जानिए कलाई पर बंधे धागे का विज्ञान और इतिहास

​रक्षाबंधन को हम भाई-बहन के अटूट प्रेम का प्रतीक मानते हैं, लेकिन हमारे पुराण और विज्ञान इस पवित्र धागे के बारे में कुछ और भी दिलचस्प बातें बताते हैं।

​पहला रक्षासूत्र पत्नी ने पति को बांधा था:

भविष्य पुराण के अनुसार, देवताओं और दानवों के युद्ध में देवराज इंद्र की रक्षा के लिए उनकी पत्नी इंद्राणी (शची) ने श्रावण पूर्णिमा पर उन्हें मंत्रोच्चार के साथ पहला रक्षासूत्र बांधा था। इसके प्रभाव से देवताओं की जीत हुई थी। यानी मूल रूप से यह सुरक्षा, मंगल और कल्याण का प्रतीक था, जो बाद की परंपराओं में भाई-बहन के पर्व के रूप में विकसित हुआ।

​21 दिन बाद धागा बदलने की मान्यता:

कलाई पर बंधी मौली या रक्षासूत्र शरीर और मन की मंगलकामना से जुड़ा है। इसे तब तक पहनना चाहिए, जब तक यह साफ और सुरक्षित रहे। धागा मैला या जीर्ण-शीर्ण होने पर इसे बदलने की परंपरा है। कुछ आधुनिक मान्यताओं में इसे 21 दिन बाद बदलने की बात कही गई है, हालांकि शास्त्रों में ऐसा कोई सार्वभौमिक नियम निर्धारित नहीं है।

​धागे के रंगों का विज्ञान:

रक्षासूत्र के रंग सिर्फ सजावट नहीं हैं, बल्कि इनका हमारे मन पर गहरा मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ता है:

​लाल रंग: यह ऊर्जा, शक्ति और सतर्कता का भाव जगाता है।

​पीला रंग: इसे खुशी, आशावाद और भारी उत्साह से जुड़ा माना जाता है।

​यही वजह है कि भारतीय परंपराओं में रंगीन धागे आस्था के साथ-साथ हमारी भावनाओं की भाषा भी बन गए हैं।