भारत में हृदय रोग, कैंसर और सिज़ेरियन ऑपरेशन्स के मामलों में अप्रत्याशित वृद्धि देखी जा रही है। पहले जहां 99 प्रतिशत प्रसव सामान्य होते थे, वहीं अब 80 प्रतिशत तक मामले सिज़ेरियन के आ रहे हैं। कम उम्र के बच्चों में डायबिटीज, कोलेस्ट्रॉल और हार्ट फेलियर जैसी गंभीर बीमारियां फैल रही हैं। इस चिंताजनक स्थिति के पीछे दवा कंपनियों, अस्पतालों और लचर शिक्षा व्यवस्था के बीच एक सुनियोजित गठजोड़ की आशंका जताई जा रही है।
देश में बढ़ते हार्ट अटैक, कैंसर और सिज़ेरियन ऑपरेशन्स पर उठे सवाल
नई दिल्ली: भारत में स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े आंकड़ों ने आम नागरिकों से लेकर नीति-निर्माताओं तक को चिंता में डाल दिया है। देश में बढ़ते हार्ट अटैक, कैंसर और सिज़ेरियन ऑपरेशन्स को लेकर अब एक नई बहस छिड़ गई है। सवाल उठाए जा रहे हैं कि क्या भारतीयों को जानबूझकर बीमार बनाए रखने का कोई वैश्विक या कॉर्पोरेट एजेंडा काम कर रहा है।
अस्पतालों में इलाज तो मिल रहा है, लेकिन किसी भी बीमारी के मूल कारण (Root Cause) पर बात करने से डॉक्टर और चिकित्सा तंत्र कतरा रहे हैं।
99% नॉर्मल डिलीवरी से 80% सिज़ेरियन का सफर: एक सोची-समझी योजना?
पूर्व के समय में भारत में लगभग 99 प्रतिशत प्रसव सामान्य (नॉर्मल डिलीवरी) हुआ करते थे। महिलाओं को गर्भावस्था के दौरान सक्रिय रहने और घरेलू कार्य करने की सलाह दी जाती थी।
आरोप हैं कि आज के दौर में निजी अस्पतालों और डॉक्टरों द्वारा पहले महीने से ही आराम करने की सलाह दे दी जाती है, जिससे अंततः मामला सिज़ेरियन ऑपरेशन तक पहुंच जाए। आज शहरों में 80 प्रतिशत से अधिक प्रसव ऑपरेशन के जरिए हो रहे हैं, जिसे एक बड़े व्यापारिक खेल के रूप में देखा जा रहा है।
छोटे बच्चों में हार्ट अटैक, कैंसर और डायबिटीज की बाढ़
चिकित्सा विशेषज्ञों और समीक्षकों का दावा है कि जो बीमारियां पहले बुजुर्गों को हुआ करती थीं, वे अब छोटे बच्चों और युवाओं को अपना शिकार बना रही हैं।
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हृदय रोग: युवाओं में हार्ट अटैक और हार्ट फेलियर के मामले तेजी से बढ़े हैं।
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कैंसर का प्रकोप: महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर और पुरुषों में प्रोस्टेट कैंसर के मामलों में भारी उछाल आया है। इसके साथ ही ल्यूकेमिया (ब्लड कैंसर) और लंग कैंसर आम होते जा रहे हैं।
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अन्य जीवनशैली जनित रोग: बच्चों में विटामिन डी, कैल्शियम की कमी, इंसोमनिया (अनिद्रा) और मानसिक अवसाद (डिप्रेशन) महामारी का रूप ले चुके हैं।
बीमारियों के मूल कारण पर मौन क्यों?
इस संकट का सबसे स्याह पहलू यह है कि डॉक्टर दवाइयां तो लिख रहे हैं, लेकिन बीमारी की मुख्य वजह नहीं बता रहे हैं। यहां तक कि देश की संसद में भी इस बात पर व्यापक विमर्श नहीं हो रहा है कि आखिर भारतीयों का स्वास्थ्य इतनी तेजी से क्यों गिर रहा है।
चिकित्सा व्यवस्था में 'प्रिवेंशन इज़ बेटर देन क्योर' (बचाव ही इलाज से बेहतर है) के सिद्धांत को पूरी तरह हाशिए पर डाल दिया गया है, ताकि दवा कंपनियों का मुनाफा लगातार बढ़ता रहे।
निष्कर्ष: क्या सचमुच चल रहा है दवाओं का बड़ा कारोबार?
यदि देश की युवा आबादी इसी तरह गंभीर बीमारियों की चपेट में आती रही, तो भारत का डेमोग्राफिक डिविडेंड (जनसांख्यिकीय लाभांश) एक बड़े संकट में बदल जाएगा। दवा कंपनियों, अस्पतालों और अधिकारियों के इस कथित गठजोड़ पर जब तक कड़े नियामक कानून नहीं बनेंगे और प्रिवेंटिव हेल्थकेयर को बढ़ावा नहीं दिया जाएगा, तब तक आम भारतीय नागरिक केवल एक 'मेडिकल कस्टमर' बनकर रह जाएगा।