आयुष्मान योजना से हित एलॉपथी का या आपका ?

आयुष्मान योजना से हित एलॉपथी का या आपका ?

आयुष्मान भारत में 'आयुष' गायब: क्या यह सिर्फ एलोपैथी को फायदा पहुंचाने की नीति है?

नई दिल्ली: भारत सनातन काल से ही 'पहला सुख निरोगी काया' के सिद्धांत पर चलता आया है। महर्षि चरक, सुश्रुत, पतंजलि और वाग्भट की इस भूमि पर आज एक बड़ा विरोधाभास देखने को मिल रहा है। सरकार ने देश के गरीबों के लिए 'आयुष्मान भारत योजना' की शुरुआत तो की, लेकिन इसके ढांचे को लेकर अब तीखे सवाल उठ रहे हैं कि आखिर आयुष्मान योजना से हित एलॉपथी का या आपका ?

इस योजना के नाम में 'आयुष' की झलक है, लेकिन इसके तहत मिलने वाले लाभों से देश की प्राचीन चिकित्सा पद्धतियों को लगभग बेदखल कर दिया गया है।

नाम आयुष्मान, लेकिन आयुष (AYUSH) का नामोनिशान नहीं!

वर्तमान व्यवस्था के अनुसार, यदि किसी नागरिक के पास आयुष्मान कार्ड या कोई अन्य कमर्शियल हेल्थ इंश्योरेंस है, तो वह केवल एलोपैथिक अस्पताल में जाकर अंग्रेजी दवाइयों और सर्जरी का खर्च ही क्लेम कर सकता है।

यदि कोई व्यक्ति प्राकृतिक चिकित्सा (नेचुरोपैथी), आयुर्वेद या होम्योपैथी के माध्यम से बिना किसी साइड-इफेक्ट के अपना इलाज कराना चाहे, तो बीमा कंपनियां और सरकारी नीतियां उसे इसकी अनुमति नहीं देतीं। यह स्थिति सीधे तौर पर एलोपैथी के एकाधिकार और दवा कंपनियों के भारी-भरकम टर्नओवर को पोषित करती है।

अंग्रेजों का थोपा हुआ मेडिकल सिस्टम बदलने में हिचकिचाहट क्यों?

ब्रिटिश शासनकाल में भारत की आत्मनिर्भर और निवारक (Preventive) चिकित्सा व्यवस्था को नष्ट कर एलोपैथी को थोपा गया था। आजादी के दशकों बाद भी हम उसी औपनिवेशिक ढर्रे पर चल रहे हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि 12वीं के बाद चिकित्सा शिक्षा में एक 'एकीकृत पाठ्यक्रम' (Integrated Course) होना चाहिए, जिसमें 4 साल तक शरीर विज्ञान के साथ-साथ आयुर्वेद, योग और नेचुरोपैथी सभी विधाओं को एक साथ पढ़ाया जाए। परंतु आज बीएएमएस (BAMS) और एमबीबीएस (MBBS) के पाठ्यक्रमों को इस तरह अलग कर दिया गया है जैसे इंसानी शरीर अलग-अलग हों।

स्कूली पाठ्यक्रम से 'स्वास्थ्य विज्ञान' गायब

चिंता की बात यह भी है कि प्राथमिक और जूनियर हाई स्कूल के पाठ्यक्रमों में बच्चों को स्वास्थ्य विज्ञान, आहार विज्ञान या ऋतुचर्या (किस मौसम में क्या खाना चाहिए और क्या नहीं) के बारे में कुछ भी नहीं पढ़ाया जा रहा है।

  • सरकारों ने 'शिक्षामित्र' तो नियुक्त किए, लेकिन गांवों के स्कूलों में 'योगमित्र' या 'स्वास्थ्य मित्र' की नियुक्ति नहीं की।

  • बच्चों को सूर्य चिकित्सा या जल चिकित्सा के बुनियादी नियम नहीं सिखाए जाते, जिससे वे बचपन से ही कुपोषण और दवाओं पर निर्भर हो जाते हैं।

निष्कर्ष: प्रिवेंशन बनाम क्योर की जंग

एलोपैथी का सिद्धांत बीमारी होने के बाद उसे दबाने (Cure) पर आधारित है, जबकि आयुर्वेद और नेचुरोपैथी बीमारी को होने ही नहीं देने (Prevention) पर काम करते हैं। जब तक देश का स्वास्थ्य मंत्रालय अपने बजट और बीमा योजनाओं का रुख एलोपैथी के सिंडिकेट से हटाकर भारतीय प्रणालियों की ओर नहीं मोड़ेगा, तब तक आम जनता का स्वास्थ्य दांव पर लगा रहेगा।