गृह मंत्री अमित शाह से मिला कैथोलिक डेलीगेशन: FCRA और विदेशी फंडिंग पर हुई तीखी चर्चा
नई दिल्ली: केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और देश की प्रमुख ईसाई संस्था 'कैथोलिक बिशप कॉन्फ्रेंस ऑफ इंडिया' (CBCI) के पदाधिकारियों के बीच हाल ही में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और संवेदनशील बैठक हुई। वरिष्ठ पत्रकारों के अनुसार, लगभग 45 मिनट तक चली इस मुलाकात में देश के विभिन्न हिस्सों—जैसे केरल, आंध्र प्रदेश और पूर्वोत्तर (नॉर्थ-ईस्ट)—से आए ईसाई संगठनों के बड़े पदाधिकारी शामिल थे। इस बैठक का मुख्य केंद्र बिंदु एफसीआरए (FCRA) कानून के कड़े प्रावधान, विदेशी फंडिंग और इसके देश पर होने वाले प्रभाव रहे।
पृष्ठभूमि: 1944 की संस्था और सरकार के बीच का संवाद
कैथोलिक बिशप कॉन्फ्रेंस ऑफ इंडिया (CBCI) वर्ष 1944 से संचालित एक प्रतिष्ठित और बड़ी संस्था है, जो भारत में कैथोलिक ईसाइयों के मामलों का प्रतिनिधित्व करती है। हालिया दिनों में विदेशी अंशदान (नियमन) अधिनियम यानी एफसीआरए (FCRA) में किए गए संशोधनों और सख्त रुख के बाद से ईसाई संगठनों और एनजीओ के बीच कई तरह की चिंताएं देखी जा रही थीं। इसी संदर्भ में संस्था के प्रतिनिधियों ने गृह मंत्री से मिलकर अपनी आपत्तियां दर्ज कराने का समय मांगा था।
महत्वपूर्ण वक्तव्य: अमित शाह ने आंकड़ों से दिया जवाब
मुलाकात के दौरान कैथोलिक संगठन के प्रतिनिधियों ने यह आशंका जताई कि एफसीआरए बिल को शायद उनके संगठनों को ध्यान में रखकर या उन्हें निशाना बनाने के उद्देश्य से लाया गया है, जिससे उनके सामाजिक कार्य प्रभावित हो रहे हैं।
इस पर गृह मंत्री अमित शाह ने तथ्यात्मक आंकड़ों का हवाला देते हुए स्थिति स्पष्ट की। अमित शाह के अनुसार:
"देश में आने वाली कुल 17,000 करोड़ रुपये की विदेशी फंडिंग (FCRA) में से सभी ईसाई संगठनों और एनजीओ को मिलाकर केवल 3,000 करोड़ रुपये (लगभग 15 प्रतिशत) ही मिलते हैं। जब आपका हिस्सा कुल फंडिंग का महज 15% है, तो आप यह कैसे सोच सकते हैं कि यह कानून सिर्फ आपके लिए बनाया गया है?"
गृह मंत्री ने स्पष्ट कहा कि बाकी 14,000 करोड़ रुपये किसके पास आ रहे हैं, यह भी जांच का विषय है और कानून का दायरा सभी के लिए एक समान है।
मुख्य तर्क: तीन बड़े मुद्दों पर सरकार का रुख स्पष्ट
बैठक के दौरान मुख्य रूप से तीन बड़े मुद्दों पर चर्चा केंद्रित रही:
1. मणिपुर हिंसा और चर्च की भूमिका
बैठक में जब मणिपुर का मुद्दा उठा, तो गृह मंत्री अमित शाह ने स्पष्ट रूप से कहा कि मणिपुर का विवाद कोई धार्मिक लड़ाई नहीं है, बल्कि यह दो जातीय समूहों (Ethnic Tribes) के बीच का संघर्ष है। गृह मंत्री ने ईसाई संगठनों से अपील करते हुए कहा कि यदि चर्च और मिशनरियां चाहें, तो वे वहां शांति स्थापित करने और दोनों पक्षों के बीच संवाद बहाल करने में भारत सरकार की मदद कर सकते हैं। सरकार राष्ट्र निर्माण में ईसाई मिशनरियों के योगदान को स्वीकार करती है, लेकिन वहां शांति बहाली के लिए सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता है।
2. अनुसूचित जाति (SC) का दर्जा और सुप्रीम कोर्ट का आदेश
चर्चा के दौरान यह मुद्दा भी उठा कि ईसाई धर्म अपना चुके अनुसूचित जनजाति (ST) और अनुसूचित जाति (SC) के लोगों में 'डीलिस्टिंग' को लेकर चिंताएं हैं। इस पर कानूनी और संवैधानिक पहलुओं का हवाला देते हुए स्पष्ट किया गया कि ईसाई धर्म में जाति व्यवस्था को स्वीकार नहीं किया जाता है। सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों के अनुसार, एक बार धर्म परिवर्तन कर लेने के बाद व्यक्ति अनुसूचित जाति (SC) के दायरे से बाहर हो जाता है, क्योंकि यह व्यवस्था हिंदू समाज और उससे जुड़े वर्गों की कुरीतियों को दूर करने के लिए थी।
3. कथित हमलों पर एफआईआर की सलाह
कैथोलिक प्रतिनिधियों ने शिकायत की कि कुछ हिंदू संगठनों द्वारा उन पर हमले या आक्रामक रुख अपनाया जा रहा है। इस पर अमित शाह ने दो टूक सलाह दी कि जब भी ऐसी कोई घटना हो, तो पीड़ित पक्ष को तुरंत स्थानीय पुलिस में एफआईआर (FIR) दर्ज करानी चाहिए। यदि एफआईआर के बाद भी प्रशासन कार्रवाई नहीं करता है, तब सरकार की जवाबदेही तय होगी। केवल एकतरफा नैरेटिव बनाने से कानून व्यवस्था नहीं चलती।
समाज पर प्रभाव और सरकार का संकल्प
इस पूरी बातचीत से सरकार ने यह संदेश बेहद स्पष्ट और ऊंचे स्वर में (Clear and Loud) दे दिया है कि देश में अब 'अराजकतावादी फंडिंग' के दिन लद चुके हैं। सरकार का एक सूत्रीय एजेंडा है कि विदेशी पैसों के दम पर भारत में जनसांख्यिकीय परिवर्तन (Demographic Change) या सामाजिक समरसता को बिगड़ने नहीं दिया जाएगा। चाहे वह मदरसे हों, ईसाई मिशनरियां हों, एनजीओ हों या फिर कोई विदेशी मीडिया संस्था—सभी को भारत के कानून के दायरे में रहकर और पूरी पारदर्शिता के साथ ही काम करना होगा।
निष्कर्ष
यह बैठक इस बात का साफ संकेत है कि वर्तमान सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेशी धन के विनियमन को लेकर किसी भी प्रकार के दबाव में झुकने वाली नहीं है। वैध और कानूनी तरीके से देश के विकास में योगदान देने वाले संगठनों का स्वागत है, परंतु लोभ-लालच, जबरन धर्म परिवर्तन या अवैध फंडिंग के जरिए राष्ट्र विरोधी गतिविधियों को अंजाम देने की छूट किसी को नहीं मिलेगी।