पश्चिम बंगाल से जुड़े I-PAC मामले में Supreme Court of India में गुरुवार को सुनवाई के दौरान अहम टिप्पणी सामने आई। अदालत ने कहा कि यदि किसी राज्य में “संवैधानिक तंत्र के ठप होने” का तर्क दिया जाता है, तो इसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं, जिनमें Article 356 के तहत राष्ट्रपति शासन लागू होने की स्थिति भी बन सकती है।
यह मामला Enforcement Directorate (ED) द्वारा I-PAC के को-फाउंडर Prateek Jain के घर और दफ्तर पर की गई छापेमारी से जुड़ा है। आरोप है कि इस कार्रवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से बाधा उत्पन्न की गई।
ED ने क्या कहा?
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल Tushar Mehta ने स्पष्ट किया कि ED का यह कहना नहीं है कि पश्चिम बंगाल में पूरी तरह संवैधानिक तंत्र फेल हो गया है। उन्होंने कहा कि एजेंसी सिर्फ यह बता रही है कि इस मामले में “कानून के शासन” का उल्लंघन हुआ है।
कोर्ट की सख्त टिप्पणी
अदालत ने यह भी कहा कि अगर कोई मुख्यमंत्री जांच एजेंसी के काम में दखल देता है, तो यह लोकतंत्र के लिए गंभीर चिंता का विषय है। इससे पहले भी कोर्ट ने Mamata Banerjee के कथित हस्तक्षेप पर कड़ी प्रतिक्रिया दी थी।
ED के आरोप
ED ने कोर्ट में दावा किया कि कोलकाता में I-PAC कार्यालय पर छापेमारी के दौरान राज्य की मशीनरी का इस्तेमाल कर जांच में बाधा डाली गई। यह मामला कथित कोयला तस्करी और मनी लॉन्ड्रिंग जांच से जुड़ा बताया जा रहा है।
आगे क्या?
मामले की सुनवाई Supreme Court of India में जारी है। कोर्ट फिलहाल इस बात पर विचार कर रहा है कि जांच एजेंसियों के काम में कथित हस्तक्षेप के आरोपों की जांच किस तरह आगे बढ़े।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर केंद्र और राज्य के बीच टकराव, जांच एजेंसियों की भूमिका और संवैधानिक प्रावधानों को लेकर बहस तेज कर दी है।