स्टारलिंक के असली इरादे क्या हैं? स्पेशल रिपोर्ट: समाज सेवी हरिशंकर कुमार

स्टारलिंक के असली इरादे क्या हैं? स्पेशल रिपोर्ट: समाज सेवी हरिशंकर कुमार

स्पेशल रिपोर्ट: समाज सेवी हरिशंकर कुमार

11 हजार गांवों को इंटरनेट या डिजिटल संप्रभुता पर कब्जा? समझिए एलन मस्क के स्टारलिंक की पूरी इनसाइड स्टोरी!

नई दिल्ली: भारत में सैटेलाइट इंटरनेट के बहुचर्चित प्रोजेक्ट 'स्टारलिंक' को लेकर जिस तरह की हड़बड़ी और लॉबिंग दिखाई जा रही है, वह केवल एक कारोबारी सौदा नहीं बल्कि देश की सामरिक सुरक्षा और डिजिटल संप्रभुता से जुड़ा गंभीर सवाल है। दुनिया के सबसे अमीर शख्स एलन मस्क अक्सर सोशल मीडिया प्रोपेगैंडा और राजनीतिक प्रभाव से सरकारी नीतियों को अपने पक्ष में मोड़ने के लिए जाने जाते हैं। भारत के कुल ब्रॉडबैंड और इंटरनेट बाजार में 80% हिस्सेदारी रखने वाली घरेलू कंपनियों पर तंज कसते हुए वे जिस तरह लाइसेंस के लिए दबाव बना रहे हैं, उसके पीछे की हकीकत को एक जिम्मेदार नागरिक के नजरिए से समझना जरूरी है।

गांवों को कनेक्टिविटी का झांसा, असल निशाना स्पेस नेटवर्क

दावा किया जा रहा है कि स्टारलिंक भारत के 11 हजार दूरस्थ गांवों तक कनेक्टिविटी पहुंचाएगा, लेकिन हकीकत यह है कि इस बहाने भारत के अंतरिक्ष और इंटरनेट नेटवर्क पर पूर्ण नियंत्रण साधने की रणनीति रची जा रही है। साल 2020 में भारत में अंतरिक्ष क्षेत्र के निजीकरण के समय मस्क की कंपनी ने 2021 में बिना वैध लाइसेंस के ही सेवाएं शुरू करने का गैर-कानूनी प्रयास किया था, जिसे सरकार के कड़े रुख के बाद बंद करना पड़ा।

सुरक्षा अलर्ट को दरकिनार करने का जोखिम

भारतीय दूरसंचार कानून 2023 के तहत स्पेक्ट्रम प्रशासनिक आदेश से मिलना तय हुआ है। घरेलू कंपनियों (एयरटेल को अप्रैल 2022 और जियो को दिसंबर 2022) के बाद स्टारलिंक को जून 2025 में अथॉराइजेशन मिला। अंतिम लाइसेंस के लिए सुरक्षा क्लीयरेंस आवश्यक शर्त है, ऐसे में मस्क का भेदभाव का आरोप लगाना पूरी तरह निराधार है।

पृथ्वी की निचली कक्षा (LEO) में सक्रिय सैटेलाइट सेवाओं के जोखिमों पर पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम, इसरो और सेना पहले ही आगाह कर चुके हैं। वहीं, ईरान-यूक्रेन संघर्ष और बांग्लादेश सीमा पर स्टारलिंक की संदिग्ध भूमिका जगजाहिर रही है। मस्क के ग्रोक एआई द्वारा करोड़ों एक्स (ट्विटर) उपयोगकर्ताओं के डेटा के व्यावसायिक उपयोग और टैक्स हैवन देशों के जरिए भारत में निवेश की चालाकियों के बीच गृह और रक्षा मंत्रालय की आपत्तियों की अनदेखी देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए आत्मघाती साबित हो सकती है।