नई दिल्ली
उन्नाव रेप केस को लेकर राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रहे प्रदर्शन के दौरान उस वक्त माहौल गरमा गया, जब एक महिला कुलदीप सिंह सेंगर के समर्थन में तख्ती लेकर सामने आईं। तख्ती पर लिखा था — “I Support Kuldeep Sengar”। यह महिला खुद को पुरुष आयोग की अध्यक्ष बताने वाली बरखा त्रेहान थीं। उनके इस कदम के बाद मौके पर मौजूद प्रदर्शनकारियों ने विरोध शुरू कर दिया और कुछ देर के लिए तनाव की स्थिति बन गई।
बरखा त्रेहान के समर्थन में नारे लगाने और तख्ती लहराने से यह मुद्दा और अधिक चर्चा में आ गया। इसके बाद सवाल उठने लगे कि आखिर बरखा त्रेहान हैं कौन और उनका एजेंडा क्या है।
पुरुष आयोग की अध्यक्ष होने का दावा
बरखा त्रेहान दिल्ली की निवासी हैं और स्वयं को ‘पुरुष आयोग’ नामक एक गैर-सरकारी संगठन (NGO) की अध्यक्ष बताती हैं। उनका कहना है कि उनका संगठन पुरुषों से जुड़े मामलों, झूठे आरोपों और जेंडर-न्यूट्रल न्याय की पैरवी करता है। वे लगातार यह मुद्दा उठाती रही हैं कि कानून और समाज में पुरुषों के साथ होने वाले अन्याय को भी गंभीरता से देखा जाना चाहिए।
लेखक, वक्ता और फिल्म निर्देशक
बरखा त्रेहान TEDx स्पीकर रह चुकी हैं और लेखन से भी जुड़ी हैं। वे अलग-अलग समाचार माध्यमों में सामाजिक मुद्दों पर अपने विचार रखती हैं। इसके अलावा उन्होंने “The Curse of Manhood” नाम की एक डॉक्यूमेंट्री भी बनाई है, जिसमें पुरुषों से जुड़े सामाजिक दबावों और मानसिक संघर्षों को दिखाया गया है।
कुलदीप सेंगर मामले पर क्या बोलीं बरखा?
उन्नाव केस को लेकर बरखा त्रेहान ने कहा कि अदालत द्वारा बेल दिया जाना एक कानूनी प्रक्रिया है और इसे राजनीतिक रंग नहीं दिया जाना चाहिए। उनका कहना है कि कुलदीप सिंह सेंगर कई वर्षों से जेल में है और बेल किसी भी आरोपी का मौलिक अधिकार है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि बेल का मतलब निर्दोष घोषित किया जाना नहीं होता, लेकिन इस मुद्दे पर सड़क पर प्रदर्शन कर राजनीति करना उचित नहीं है।
पहले भी विवादों में आ चुकी हैं
यह पहला मौका नहीं है जब बरखा त्रेहान किसी संवेदनशील मामले में सामने आई हों। इससे पहले निक्की भाटी मौत मामले में भी वे मृतका के पति के गांव पहुंची थीं। उस दौरान उन्होंने दावा किया था कि पुलिस ने एकतरफा कार्रवाई की और कई निर्दोष लोगों को हिरासत में लिया गया।
बढ़ती बहस
बरखा त्रेहान के इस कदम के बाद सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक बहस तेज हो गई है। एक पक्ष इसे न्यायिक प्रक्रिया का समर्थन बता रहा है, तो दूसरा पक्ष इसे पीड़िता के प्रति असंवेदनशील करार दे रहा है।