चंडीगढ़: आसाराम बापू और उनके बेटे नारायण साईं के खिलाफ दर्ज मामलों के मुख्य गवाह महेंद्र चावला को पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट और पानीपत की निचली अदालत से दोहरा झटका लगा है। वर्ष 2015 में चावला पर हुए जानलेवा हमले के मामले में हाईकोर्ट ने पानीपत सत्र न्यायालय में चल रहे ट्रायल (मुकदमे की कार्यवाही) पर रोक लगाने की गवाह की मुख्य मांग को सिरे से ठुकरा दिया है।
इस मामले में नारायण साईं की ओर से पैरवी कर रहे वकील धर्मेंद्र मिश्रा ने बताया कि महेंद्र चावला ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर पानीपत कोर्ट में चल रहे ट्रायल को रोकने की गुहार लगाई थी। अधिवक्ता मिश्रा ने जानकारी दी कि हाईकोर्ट द्वारा ट्रायल पर रोक लगाने से इनकार करने के बाद, पानीपत की ट्रायल कोर्ट ने भी मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए गवाही की प्रक्रिया तेज कर दी।
वारंट और जुर्माने के बाद 2 मार्च को हुई गवाही
अधिवक्ता धर्मेंद्र मिश्रा के अनुसार, ट्रायल कोर्ट द्वारा गवाही दर्ज कराने के आदेश के बावजूद महेंद्र चावला अदालत में पेश नहीं हो रहे थे। इस पर अदालत ने सख्ती दिखाते हुए चावला के खिलाफ जमानती वारंट (Bailable Warrant) जारी कर दिया और साथ ही 10 हजार रुपये का जुर्माना भरने का आदेश भी दिया। ट्रायल कोर्ट की इस सख्त कार्रवाई के बाद, महेंद्र चावला को आखिरकार 2 मार्च को अदालत में उपस्थित होना पड़ा और अपनी गवाही दर्ज करानी पड़ी।
याचिका लंबित रहने से ट्रायल पर नहीं पड़ेगी रोक
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया है कि चावला की याचिका के हाईकोर्ट में लंबित रहने को ट्रायल कोर्ट की आगे की कार्यवाही में किसी भी प्रकार की बाधा (Stay) नहीं माना जाएगा। सुनवाई के दौरान राज्य अपराध शाखा (स्टेट क्राइम ब्रांच), मधुबन के पुलिस उपाधीक्षक (डीएसपी) ने कोर्ट में एक हलफनामा दाखिल कर जांच की वर्तमान स्टेटस रिपोर्ट सौंपी। हाईकोर्ट ने इसे रिकॉर्ड पर लेते हुए मामले की अगली सुनवाई 30 मार्च 2026 तय की है।
क्या थी गवाह चावला की दलील?
याचिकाकर्ता महेंद्र चावला ने बीएनएसएस (BNSS) की धारा 528 के तहत हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उनका आरोप है कि नारायण साईं और आसाराम के खिलाफ गवाही देने के कारण, वर्ष 2015 में उन पर जानलेवा हमला किया गया था।
चावला की दलील थी कि पुलिस ने मामले में अधूरी जांच की है और रसूखदार आरोपियों को बचाया है। उनकी मांग थी कि जब तक स्टेट क्राइम ब्रांच की एसआईटी अपनी अंतिम रिपोर्ट (Final Report) निचली अदालत में पेश नहीं कर देती, तब तक ट्रायल कोर्ट की कार्यवाही को स्थगित रखा जाए। हालांकि, न्यायपालिका ने ट्रायल रोकने की इस मांग को नामंजूर करते हुए मामले के जल्द निपटारे की ओर कदम बढ़ा दिए हैं।