महेंद्र चावला केस में आसाराम बापू को कोर्ट से क्लीन चिट, लेकिन मीडिया में खबर गायब, जन जागरण मंच ने उठाए गंभीर सवाल

महेंद्र चावला केस में आसाराम बापू को कोर्ट से क्लीन चिट, लेकिन मीडिया में खबर गायब, जन जागरण मंच ने उठाए गंभीर सवाल

नई दिल्ली भारतीय मीडिया की कार्यशैली एक बार फिर सवालों के घेरे में है। बापू आशारामजी से जुड़े महेंद्र चावला प्रकरण में अदालत द्वारा दिए गए हालिया फैसले के बाद सामाजिक संस्था जन जागरण मंच ने मीडिया पर चयनात्मक रिपोर्टिंग और एकतरफा कवरेज के आरोप लगाए हैं।

जन जागरण मंच के हरिशंकर का कहना है कि जिस महेंद्र चावला को बीते वर्षों में मीडिया ने अपने स्टूडियो में बैठाकर लगातार मंच दिया और आसाराम बापू के खिलाफ नकारात्मक खबरें चलाईं, उसी महेंद्र चावला को जब अदालत ने झूठा पाया और उसकी याचिकाएं खारिज कर दीं, तो यह खबर मीडिया से लगभग पूरी तरह गायब हो गई।

 

कोर्ट का फैसला, लेकिन मीडिया से खबर गायब!! 

 

बीते  18 नवंबर 2024 को महीने महेंद्र चावला से जुड़े मामले में अदालत ने अहम फैसला सुनाते हुए बापू आसाराम जी के खिलाफ केस को बंद करने का आदेश जारी किया और 18 दिसंबर को भी चावला की 311  की अर्जी को खारिज कर दिया। इस फैसले के साथ ही इस प्रकरण में आसाराम बापू को कोर्ट से क्लीन चिट मिली।

कानूनी दृष्टि से यह फैसला महत्वपूर्ण माना जा रहा है, लेकिन इसके बावजूद इस खबर को मुख्यधारा मीडिया में अपेक्षित स्थान नहीं मिला।

 

नकारात्मक खबरों को मिली प्रमुखता

 

जन जागरण मंच  का कहना है जब महेंद्र चावला के बयान आसाराम बापू के खिलाफ सामने आए थे, उस समय टीवी चैनलों और डिजिटल पोर्टलों पर दिन-रात नकारात्मक खबरें चलाई गईं। मीडिया डिबेट्स में महेंद्र चावला को विश्वसनीय गवाह के रूप में प्रस्तुत किया गया और अदालत के फैसले से पहले ही जनमत तैयार कर दिया गया।

 

PTI–UNI सहित कई मीडिया हाउसों को भेजा गया प्रेस नोट

 

सामाजिक संस्था जन जागरण मंच का दावा है कि कोर्ट के फैसले के बाद PTI, UNI सहित दर्जनों मीडिया हाउसों को विधिवत प्रेस नोट जारी किया गया। इसके बावजूद न तो महेंद्र चावला की अर्जी खारिज होने की खबर प्रमुखता से प्रकाशित की गई और न ही आसाराम बापू को मिली क्लीन चिट को समाचार बनाया गया।

 

चयनात्मक पत्रकारिता पर सवाल

 

जन जागरण मंच ने सवाल उठाया है कि यदि मीडिया आरोपों और सनसनीखेज बयानों को प्रमुखता से दिखा सकती है, तो फिर अदालत से आए तथ्यों और फैसलों को उसी गंभीरता से क्यों नहीं दिखाया जाता।

संस्था का कहना है कि इस प्रकार की चयनात्मक पत्रकारिता न केवल जनता को भ्रमित करती है, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया पर भी प्रश्नचिह्न लगाती है।

मीडिया ट्रायल बनाम न्याय

विशेषज्ञों का मानना है कि मीडिया का काम सूचना देना है, न कि अदालत की भूमिका निभाना। जब किसी मामले में कोर्ट से फैसला आ जाता है, तो उसे उसी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाना चाहिए, जिस प्रमुखता से आरोपों को दिखाया गया था।

जन जागरण मंच की मांग - जन जागरण मंच ने मांग की है कि मीडिया अदालत के फैसलों को निष्पक्ष रूप से प्रकाशित करेआरोप और फैसला दोनों को समान महत्व दे

डिस्क्लेमर

यह समाचार रिपोर्ट सार्वजनिक न्यायिक आदेशों, सामाजिक संस्था के बयानों और उपलब्ध तथ्यों पर आधारित है। इसका उद्देश्य न्यायालयीन प्रक्रिया में हस्तक्षेप नहीं, बल्कि मीडिया आचरण पर विमर्श प्रस्तुत करना है