किराए पर रहने का नया फॉर्मूला: न ब्रोकर का झंझट, न फर्नीचर की टेंशन; छोटे शहरों में भी छाया 'को-लिविंग स्पेस' का जलवा

किराए पर रहने का नया फॉर्मूला: न ब्रोकर का झंझट, न फर्नीचर की टेंशन; छोटे शहरों में भी छाया 'को-लिविंग स्पेस' का जलवा

किराए पर रहने का नया फॉर्मूला: न ब्रोकर का झंझट, न फर्नीचर की टेंशन; छोटे शहरों में भी छाया 'को-लिविंग स्पेस' का जलवा

नई दिल्ली: पढ़ाई और करियर की तलाश में दूसरे शहरों का रुख करने वाले युवाओं के बीच रहने का तौर-तरीका अब पूरी तरह बदल रहा है। पारंपरिक किराए के मकान और हॉस्टल के झंझटों को पीछे छोड़ते हुए छात्र और कामकाजी युवा अब 'को-लिविंग यानी शेयरिंग स्पेस' को तेजी से अपना रहे हैं। केवल मेट्रो शहर ही नहीं, बल्कि लखनऊ, इंदौर और जयपुर जैसे टियर-2 और छोटे शहरों में भी इसका बाजार जबरदस्त रफ्तार पकड़ रहा है।

ग्लोबल रियल एस्टेट कंसल्टेंसी कोलियर्स (Colliers) की रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में को-लिविंग सेक्टर में संगठित बेड की संख्या 3 लाख थी, जो 2030 तक तीन गुना से अधिक बढ़कर लगभग 10 लाख (1 मिलियन) होने का अनुमान है। वहीं इसका सालाना बाजार ₹4,000 करोड़ से 5 गुना छलांग लगाकर ₹20,000 करोड़ तक पहुंच जाएगा।

को-लिविंग क्यों बन रहा है युवाओं की पहली पसंद?

  • 20 से 35% तक की बचत: पारंपरिक 1BHK या 2BHK फ्लैट की तुलना में को-लिविंग में रहना 20 से 35% तक सस्ता पड़ता है। उदाहरण के लिए, मुंबई में जहां 1BHK का खर्च ₹19,000–42,000 आता है, वहीं को-लिविंग मात्र ₹15,200–27,500 में मिल जाता है।

  • ऑल-इन-वन सुविधाएं: एक ही किराए में फर्निश्ड कमरा, हाई-स्पीड वाई-फाई, हाउसकीपिंग (सफाई), सुरक्षा, खाना, जिम और कम्युनिटी इवेंट्स शामिल होते हैं।

  • सुरक्षा को पहली प्राथमिकता: आईआईटी रुड़की के एक शोध के अनुसार, लगभग 70.9% छात्र कमरा चुनते समय सुरक्षा को सबसे ऊपर रखते हैं। को-लिविंग स्पेस में मिलने वाली बायोमेट्रिक और डिजिटल सुरक्षा इसे छात्रों और छात्राओं दोनों के लिए सबसे मुफीद बनाती है।

कॉर्पोरेट सेक्टर में हाइब्रिड वर्क मॉडल और विश्वविद्यालयों में बढ़ती छात्रों की संख्या के चलते यह 'प्लग एंड प्ले' लाइफस्टाइल आने वाले समय में रेंटल मार्केट की पूरी तस्वीर बदलने जा रही है।