राजस्थान के कोटा दौरे पर पहुंचे शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय मुद्दों पर खुलकर अपनी बात रखी। उन्होंने अमेरिका, ईरान और इजरायल के बीच चल रहे तनाव पर चिंता जताते हुए कहा कि दुनिया में “न्याय” और “अन्याय” की स्पष्ट चर्चा नहीं हो रही है।
शंकराचार्य ने कहा कि वैश्विक स्तर पर हो रहे संघर्षों में यह तय होना चाहिए कि कौन न्याय के पक्ष में है और कौन अन्याय के। उन्होंने सवाल किया कि समाज के विद्वान इस विषय पर खुलकर क्यों नहीं बोल रहे हैं। उनके मुताबिक, यदि न्याय-अन्याय की स्पष्ट पहचान होगी तो संघर्ष कर रहे देशों पर भी नैतिक दबाव बनेगा।
कोटा के छात्रों और कोचिंग सिस्टम पर टिप्पणी
कोटा में बढ़ते छात्र आत्महत्या के मामलों पर उन्होंने कोचिंग संस्थानों की भूमिका पर सवाल उठाए। शंकराचार्य ने कहा कि कोचिंग संस्थान छात्रों को सफलता के लिए तैयार करते हैं, लेकिन असफलता से निपटने की मानसिक ताकत नहीं सिखाते।
उन्होंने सुझाव दिया कि कोचिंग संचालकों को छात्रों के लिए विशेष सत्र आयोजित करने चाहिए, जिसमें उन्हें असफलता को स्वीकार करना और उससे उबरना सिखाया जाए। उन्होंने यह भी कहा कि एक बार असफल होना जीवन का अंत नहीं है, बल्कि कई लोग बार-बार असफल होकर ही सफलता तक पहुंचे हैं।
हिंदू राष्ट्र और गौ रक्षा पर बयान
भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने की बहस पर शंकराचार्य ने कहा कि अगर ऐसा होता है तो यह अच्छी बात हो सकती है, लेकिन इसके साथ जिम्मेदारियां भी जुड़ी होंगी। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर हिंदू राष्ट्र बनने के बाद भी गायों की हत्या होती रही तो यह स्थिति कैसी होगी।
उन्होंने कहा कि जो लोग हिंदू राष्ट्र की मांग कर रहे हैं, उन्हें पहले गौ माता की सुरक्षा के लिए सख्त कानून सुनिश्चित करना चाहिए, ताकि ऐसी विसंगतियां सामने न आएं।
सरकार और संतों के संबंध पर प्रतिक्रिया
सरकार और संतों के बीच विवाद के सवाल पर उन्होंने कहा कि दोनों के बीच मूल रूप से कोई टकराव नहीं है। हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि जब तक शासन व्यवस्था पूरी तरह भारतीय मूल्यों को नहीं अपनाती, तब तक उसे पूरी तरह “अपनी” सरकार कहना मुश्किल है।
धमकियों को लेकर भी जताई चिंता
शंकराचार्य ने यह भी दावा किया कि गौ रक्षा जैसे मुद्दों पर सवाल उठाने पर उनकी आवाज दबाने की कोशिश की जाती है और उन्हें धमकियां भी मिलती हैं। उन्होंने कहा कि कुछ संगठन खुद को सनातन का समर्थक बताते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर गौ सेवा को लेकर गंभीर प्रयास नहीं करते।