तुलसी पूजन और सत्संग: घर-घर में आस्था की परंपरा, आश्रम की ओर से देशभर में कार्यक्रम

तुलसी पूजन और सत्संग: घर-घर में आस्था की परंपरा, आश्रम की ओर से देशभर में कार्यक्रम

भारतीय घरों में तुलसी का पौधा सिर्फ एक पौधा नहीं, बल्कि आस्था और संस्कार का प्रतीक माना जाता है। सुबह-शाम तुलसी के आगे दीपक जलाना और जल चढ़ाना सदियों पुरानी परंपरा है। कार्तिक मास में तुलसी पूजन का खास महत्व बताया गया है। इसी परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए ashram.org पर दर्ज जानकारी के अनुसार देश के अलग-अलग शहरों में सत्संग और तुलसी पूजन के कार्यक्रम आयोजित होते रहे हैं।

शहर-शहर सत्संग के आयोजन

आश्रम की वेबसाइट पर सूरत, आगरा, राजकोट, उल्हासनगर और कई अन्य जगहों पर हुए सत्संग, तुलसी पूजन और गीता जयंती से जुड़े कार्यक्रमों का ब्योरा दिया गया है। इन कार्यक्रमों में भजन-कीर्तन, तुलसी पूजन और तुलसी के पौधों के वितरण जैसी गतिविधियां शामिल रहीं। हर साल 25 दिसंबर को 'तुलसी पूजन दिवस' मनाने का आह्वान भी किया जाता है।

तुलसी का धार्मिक महत्व

सनातन परंपरा में तुलसी को भगवान विष्णु की प्रिय माना गया है। धार्मिक ग्रंथों में तुलसी दल के बिना भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण का भोग अधूरा माना जाता है। कार्तिक मास में तुलसी विवाह की परंपरा भी इसी आस्था से जुड़ी है। मान्यता है कि जिस घर में तुलसी की नियमित पूजा होती है, वहां सकारात्मक वातावरण बना रहता है।

घर पर तुलसी पूजन की सरल विधि

  • सुबह स्नान के बाद तुलसी को स्वच्छ जल अर्पित करें।
  • शाम को तुलसी के पास घी का दीपक जलाएं।
  • रोली, अक्षत और फूल चढ़ाकर परिक्रमा करें।
  • तुलसी नामाष्टक या कोई भजन श्रद्धा से गाएं।
  • परंपरा के अनुसार रविवार और एकादशी को तुलसी दल न तोड़ें।

सत्संग से जुड़ता है परिवार

सत्संग का अर्थ है अच्छे विचारों और सज्जनों का संग। संतों और विद्वानों का मानना है कि सामूहिक सत्संग से परिवार और समाज में मेलजोल बढ़ता है और बच्चों में संस्कार आते हैं। व्यस्त जीवन में कुछ समय भजन, कथा और सत्संग के लिए निकालना मन को शांति देता है। अपने नजदीकी कार्यक्रमों की जानकारी आयोजकों की वेबसाइट या स्थानीय केंद्र से ली जा सकती है।