KGMU Love Jihad और धर्मांतरण मामला: STF रिपोर्ट में 29 मुस्लिम स्टाफ आरोपी, 12 हिन्दू महिलायें पीड़ित

KGMU Love Jihad और धर्मांतरण मामला: STF रिपोर्ट में 29 मुस्लिम स्टाफ आरोपी, 12 हिन्दू महिलायें पीड़ित

लखनऊ के किंग जॉर्ज मेडिकल विश्वविद्यालय (KGMU) में Love Jihad और धर्मांतरण के आरोपों को लेकर उत्तर प्रदेश पुलिस की स्पेशल टास्क फोर्स (STF) की रिपोर्ट ने हलचल मचा दी है। शासन ने रिपोर्ट विश्वविद्यालय को भेजकर नियमों के तहत कार्रवाई करने और की गई कार्रवाई की रिपोर्ट देने को कहा है। विश्वविद्यालय ने आंतरिक जांच शुरू करने का फैसला किया है और 6 नवंबर को इस पर बैठक प्रस्तावित है।

रिपोर्ट में क्या आरोप हैं

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार STF रिपोर्ट में 29 पुरुषों का जिक्र है, जिनमें 16 डॉक्टर, प्रोफेसर और फैकल्टी सदस्य बताए गए हैं। रिपोर्ट में 12 महिलाओं को कथित पीड़िता के रूप में दर्ज किया गया है। आरोप उत्पीड़न, शादी और धर्मांतरण का दबाव, शोषण और शिकायतों को दबाने से जुड़े हैं। रिपोर्ट के मुताबिक कथित घटनाएं पैथोलॉजी, माइक्रोबायोलॉजी, रेडियोलॉजी विभागों और एक वार्ड तक फैली थीं, यानी इन्हें इक्का-दुक्का मामले नहीं बताया गया है।

दो FIR से शुरू हुई जांच

STF जांच दिसंबर 2025 में दर्ज दो आपराधिक मामलों के बाद शुरू हुई थी। पहली FIR चौक थाने में पैथोलॉजी के रेजिडेंट डॉक्टर रमीज मलिक के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता और उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम के तहत दर्ज हुई। शिकायतकर्ता ने लंबे उत्पीड़न और धर्म बदलकर शादी के दबाव का आरोप लगाया था। आरोपी को बाद में गिरफ्तार किया गया। दूसरी FIR कैसरबाग थाने में आरोपी डॉ. मोहम्मद आदिल पर शादी का झांसा देकर शोषण के आरोप में दर्ज हुई।

'इस्लामिक मेडिकोज' ग्रुप और फंडिंग का आरोप

रिपोर्ट का बड़ा हिस्सा 'इस्लामिक मेडिकोज' नाम के एक कथित समूह पर है, जिसमें KGMU और आगरा के एक मेडिकल कॉलेज के मौजूदा व पूर्व छात्रों के जुड़े होने का आरोप है। STF के अनुसार यह समूह वॉट्सऐप, पत्रिका और पुस्तिकाओं के जरिए नए छात्रों को एक विचारधारा की ओर प्रभावित करने की कोशिश करता था। रिपोर्ट यह भी आरोप लगाती है कि 2013 में परिसर के एक जिम भवन की मंजिल को नमाज स्थल में बदला गया, जबकि परिसर में मस्जिद पहले से थी। एक हिंदी दैनिक ने STF सूत्रों के हवाले से दावा किया है कि जकात के नाम पर हर महीने करीब 10 लाख रुपये जुटाए जाते थे और कई जिलों के लोगों के बैंक खातों की जानकारी मांगी गई है।

आगे क्या

ये सभी आरोप अभी जांच के दायरे में हैं और किसी भी व्यक्ति पर अदालत में दोष सिद्ध नहीं हुआ है। अब निगाह विश्वविद्यालय की बैठक और शासन को भेजी जाने वाली कार्रवाई रिपोर्ट पर है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर शिकायतें पहले से थीं, तो संस्थान के भीतर उन पर समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं हुई।