आधुनिक शिक्षा और डिजिटल दौर की भागदौड़ के बीच भारत में ऐसे गुरुकुल आज भी हैं, जहां वेदों की हजारों साल पुरानी परंपरा पूरी निष्ठा से जीवित है। दक्षिण भारत के तेलुगु भाषी क्षेत्र के छोटे से गांव कोत्तूरु ताडेपल्ली और उत्तर प्रदेश के हापुड़ से आई दो खबरें इसी परंपरा की ताकत दिखाती हैं।
कोत्तूरु ताडेपल्ली: जहां गढ़े जाते हैं घनपाठी
हरियाली से घिरे इस शांत गांव में श्री षण्मुख वेद विद्यालयम वैदिक अध्ययन का प्रमुख केंद्र है। यहां विद्यार्थी 10 से 25 साल तक कड़े अनुशासन, ब्रह्मचर्य और साधना के साथ वेद पढ़ते हैं। डॉ. कप्पगंतु रामकृष्ण के अनुसार, संहिता और क्रम पाठ के लगभग दस साल के अध्ययन के बाद विद्यार्थी को 'क्रमपाठी' या 'अवधानी' की उपाधि मिलती है। इसके बाद जटा और घन पाठ का कठिन चरण आता है, जिसमें 12 से 15 साल लगते हैं। इसे पूरा करने वाले 'घनपाठी' कहलाते हैं। आगे के विशेष अध्ययन के बाद 'सलक्षण घनपाठी' और वेदों के गूढ़ अर्थ व दर्शन में पारंगत विद्वान 'भाष्याचार्य' कहलाते हैं।
यहां किताबों से ज्यादा 'श्रुति' पद्धति पर जोर है। विद्यार्थी गुरु के मुख से सुनकर मंत्रों का सही उच्चारण, लय और स्वर याद करते हैं। यही वह तरीका है, जिससे वेद मंत्र सदियों तक बिना एक अक्षर बदले सुरक्षित रहे।
हापुड़: ततारपुर गुरुकुल में यजुर्वेद पारायण यज्ञ
उधर हापुड़ के गुरुकुल महाविद्यालय ततारपुर में 62वें वार्षिकोत्सव पर यजुर्वेद पारायण यज्ञ हुआ, जिसकी पूर्णाहुति 2 नवंबर को हुई। यज्ञ के ब्रह्मा देहरादून से आए आचार्य रविंद्र रहे और कई दंपतियों ने आहुतियां दीं। मुख्य अतिथि कल्कि पीठाधीश्वर आचार्य प्रमोद कृष्णम् ने कहा कि आने वाले समय में आर्य समाज और गुरुकुलों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होगी और लोगों को अपनी मूल संस्कृति से नहीं हटना चाहिए। गुरुकुल के ब्रह्मचारियों ने योग के विशेष आसनों का प्रदर्शन कर सबका मन मोह लिया।
- कोत्तूरु ताडेपल्ली: श्री षण्मुख वेद विद्यालयम, श्रुति पद्धति
- उपाधियां: क्रमपाठी, घनपाठी, सलक्षण घनपाठी, भाष्याचार्य
- हापुड़: ततारपुर गुरुकुल का 62वां वार्षिकोत्सव
- आयोजन: यजुर्वेद पारायण यज्ञ, पूर्णाहुति 2 नवंबर
ये गुरुकुल बताते हैं कि भारतीय ज्ञान परंपरा केवल इतिहास की किताबों में नहीं, बल्कि आज भी जीवंत रूप में आगे बढ़ रही है।