नई दिल्ली (The Jagran News):
वैश्विक अर्थव्यवस्था पर मंडरा रहा भारी कर्जे का संकट अब एक गंभीर मोड़ पर पहुंच चुका है। सरकारी बॉन्ड बाजार में मची भारी बिकवाली ने दुनिया के सबसे संपन्न और ताकतवर मुल्कों के पसीने छुड़ा दिए हैं। लंबे समय तक माना जाता रहा कि अमीर मुल्क कभी दिवालिया नहीं हो सकते, लेकिन 1980 के दशक के लातिन अमेरिकी संकट की तरह अब विकसित पश्चिमी देशों के सामने भी वित्तीय संकट का सायरन बज चुका है।
ईरान युद्ध के चलते अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में करीब 40% का उछाल आया है, जिससे वैश्विक महंगाई 4.7% तक पहुंच गई है। इससे केंद्रीय बैंकों पर ब्याज दरें ऊंची रखने का भारी दबाव है। निवेशक सरकारी बॉन्ड बेच रहे हैं, जिससे सरकारों के लिए कर्ज उठाना बेहद महंगा हो गया है। विकसित देशों को इस साल अपनी आय का लगभग 8% हिस्सा केवल पुराने कर्जों का ब्याज चुकाने में गंवाना पड़ रहा है।
यूरोप में गहराया संकट, महाशक्तियां भी बेहाल
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फ्रांस और इटली पर बड़ा खतरा: फ्रांस का सार्वजनिक कर्ज उसकी जीडीपी का लगभग 120% हो चुका है और 10-वर्षीय बॉन्ड यील्ड 4.7% तक पहुंच गई है। वहीं इटली का शुद्ध कर्ज जीडीपी के 130% के खतरनाक स्तर पर है।
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अमेरिका और ब्रिटेन पर दबाव: अमेरिका का सालाना बजट घाटा जीडीपी के 6% के बराबर पहुंच गया है। उधर जापान के 10 साल के सरकारी बॉन्ड पर ब्याज दर 1996 के बाद पहली बार 3% के पार चली गई है।
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टेक कंपनियों की नकदी की भूख: अल्फाबेट, अमेजन, मेटा और माइक्रोसॉफ्ट जैसी टेक दिग्गजों ने अकेले पहली छमाही में AI इंफ्रास्ट्रक्चर और डेटा सेंटर्स के लिए ₹31.19 लाख करोड़ का निवेश किया और ₹22.23 लाख करोड़ के बॉन्ड जारी किए, जिससे बॉन्ड यील्ड्स पर अतिरिक्त दबाव बना है।
यदि ब्याज दरों में राहत नहीं मिली, तो सरकारों के पास टैक्स बढ़ाने या जनकल्याणकारी बजट में भारी कटौती करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचेगा।