होर्मुज संकट के बीच भारत का मास्टरस्ट्रोक: समुद्र के नीचे UAE से सीधे जुड़ेगी तेल-गैस पाइपलाइन

होर्मुज संकट के बीच भारत का मास्टरस्ट्रोक: समुद्र के नीचे UAE से सीधे जुड़ेगी तेल-गैस पाइपलाइन

होर्मुज संकट के बीच भारत का मास्टरस्ट्रोक: समुद्र के नीचे UAE से सीधे जुड़ेगी तेल-गैस पाइपलाइन

नई दिल्ली:

मिडिल ईस्ट में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) पर बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा को अभेद्य बनाने के लिए ऐतिहासिक कदम उठाया है। केंद्र सरकार अब अरब सागर के नीचे से सीधे संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और ओमान से भारत तक कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस लाने वाली अंडरसी पाइपलाइन परियोजना पर मिशन मोड में काम कर रही है।

हाल ही में यूएई के विदेश व्यापार मंत्री डॉ. थानी बिन अहमद अल जेउदी से मुलाकात के बाद केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने पुष्टि की कि केंद्र सरकार ने समुद्र के नीचे सीधी पाइपलाइन परियोजना को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल कर लिया है।

इंजीनियरिंग का अनोखा करिश्मा (MEIDP प्रोजेक्ट):

मिडिल ईस्ट टू इंडिया डीप-वॉटर पाइपलाइन (MEIDP) के तहत यह लाइन ओमान और यूएई के तट से शुरू होकर गहरे अरब सागर से गुजरते हुए सीधे भारत में गुजरात और महाराष्ट्र के तटों तक पहुंचेगी।

  • लागत और दूरी: करीब ₹40,000 करोड़ की लागत से बनने वाली इस पाइपलाइन की लंबाई 1,200 से 2,000 किलोमीटर होगी।

  • क्षमता: इससे रोजाना 3.1 करोड़ मानक क्यूबिक मीटर प्राकृतिक गैस की आपूर्ति हो सकेगी। साथ ही कच्चे तेल के परिवहन पर भी तकनीकी अध्ययन शुरू हो चुका है।

  • बड़ी चुनौती: समुद्र में करीब 3,450 मीटर (साढ़े तीन किमी से अधिक) की रिकॉर्ड गहराई में अत्यधिक पानी का दबाव, समुद्री खाई और चट्टानों के बीच पाइपलाइन बिछाना दुनिया की सबसे कठिन इंजीनियरिंग चुनौतियों में से एक होगा।

भारत को क्या होगा फायदा?

भारत अपनी जरूरत का 88% कच्चा तेल आयात करता है और देश में आने वाली आधी से अधिक एलपीजी व एलएनजी इसी समुद्री मार्ग से जहाजों द्वारा आती है। सीधी पाइपलाइन बिछने से जहाजों के महंगे परिवहन और बीमे के खर्च में भारी कटौती होगी। साथ ही अंतरराष्ट्रीय तनाव या खाड़ी में जंग के हालात में भी भारत को निर्बाध तेल और गैस की सप्लाई मिलती रहेगी।

परियोजना को विकसित कर रही संस्था 'साउथ एशिया गैस एंटरप्राइज' पहले ही 25 करोड़ रुपये की लागत से 3 किमी पाइपलाइन का सफल परीक्षण कर चुकी है। सभी औपचारिकताएं पूरी होने के बाद इसके निर्माण में करीब 5 से 7 साल का वक्त लगने का अनुमान है।