मनुस्मृति विवाद: 'खड़गे संसद में अपने आरोप सिद्ध करें या माफी मांगें', देशभर में खुली बहस की उठी मांग
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के संसद में मनुस्मृति को लेकर दिए गए बयान के बाद देशभर में इस विषय पर बहस तेज हो गई है। भारत की जागरूक जनता, विभिन्न सामाजिक संगठनों और सनातन परंपरा से जुड़े लोगों की मांग है कि मनुस्मृति पर लगाए गए आरोपों के समर्थन में प्रमाण सार्वजनिक किए जाएं। यदि ऐसा संभव नहीं है तो संसद में दिए गए बयान पर सार्वजनिक रूप से माफी मांगी जाए।
मनुस्मृति को लेकर उठे विवाद के बीच जंतर-मंतर, रामलीला मैदान, कांग्रेस मुख्यालय या किसी भी सार्वजनिक मंच पर मीडिया की मौजूदगी में खुले शास्त्रार्थ की मांग भी सामने आई है। कहा गया है कि विषय राजनीतिक बयानबाजी का नहीं, बल्कि शास्त्रीय प्रमाणों का है।
मनुस्मृति की आर्य समाज द्वारा प्रकाशित प्रति, जिसमें 12 अध्याय और 1,214 श्लोक बताए गए हैं, का हवाला देते हुए कहा गया है कि संसद में जिन बिंदुओं के आधार पर मनुस्मृति की आलोचना की गई, वे इस संस्करण में नहीं मिलते। इसलिए मांग की जा रही है कि खड़गे स्पष्ट करें कि उन्होंने किस संस्करण का संदर्भ लिया था।
सनातन परंपरा से जुड़े विद्वानों का कहना है कि मनुस्मृति को केवल जाति या भेदभाव के संदर्भ में नहीं देखा जा सकता। उनके अनुसार इस ग्रंथ में सृष्टि, शिक्षा, ब्रह्मचर्य, विवाह, गृहस्थ धर्म, महिलाओं के सम्मान, राजधर्म, न्याय व्यवस्था, दंड व्यवस्था, संपत्ति, प्रायश्चित और मोक्ष सहित अनेक विषयों का विस्तार से वर्णन मिलता है।
विद्वानों का यह भी कहना है कि मनुस्मृति में "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः" जैसे श्लोक महिलाओं के सम्मान का संदेश देते हैं। साथ ही यह भी कहा जा रहा है कि भारत के कुछ न्यायिक निर्णयों में मनुस्मृति के श्लोकों का उल्लेख हुआ है तथा थाईलैंड, कंबोडिया, जावा, बाली, ब्रिटेन, जर्मनी और अमेरिका सहित अनेक देशों में इस ग्रंथ पर अध्ययन और शोध किए गए हैं।
इतिहास के कुछ शोधकर्ताओं का मत है कि मनुस्मृति के विभिन्न संस्करण प्रचलन में रहे हैं और समय-समय पर उनमें परिवर्तन या प्रक्षेप (Interpolation) को लेकर भी बहस होती रही है। इसी आधार पर यह मांग उठ रही है कि संसद में उद्धृत किए गए संस्करण को सार्वजनिक किया जाए ताकि पूरे देश के सामने तथ्यों के आधार पर चर्चा हो सके।
विवाद के बीच जनता की प्रमुख मांग यही है कि मनुस्मृति जैसे प्राचीन ग्रंथ पर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बजाय प्रमाण, मूल ग्रंथ और शास्त्रीय साक्ष्यों के आधार पर खुली बहस हो। साथ ही यह भी कहा जा रहा है कि यदि संसद में दिए गए आरोप प्रमाणित नहीं किए जा सकते, तो संबंधित बयान पर सार्वजनिक स्पष्टीकरण या माफी दी जानी चाहिए।