नेहरू गांधी परिवार और बाबर की मजार: क्या है ‘रहस्यमय’ संबंध की कहानी ?

नेहरू गांधी परिवार और बाबर की मजार: क्या है ‘रहस्यमय’ संबंध की कहानी ?

नई दिल्ली। नेहरू-गांधी परिवार और मुगल शासक बाबर को लेकर एक बार फिर राजनीतिक और ऐतिहासिक बहस तेज होती दिखाई दे रही है। लेखक और राजनीतिक टिप्पणीकार प्रदीप सिंह ने अपने कार्यक्रम ‘सत्य से साक्षात्कार’ के एक एपिसोड में नेहरू-गांधी परिवार के सदस्यों की अफगानिस्तान स्थित बाबर की मजार की यात्राओं का उल्लेख करते हुए कई सवाल उठाए हैं।

हालांकि, इन यात्राओं को किसी पारिवारिक या वंशगत संबंध का प्रमाण मानने के लिए उपलब्ध सार्वजनिक स्रोतों में कोई निर्णायक दस्तावेज सामने नहीं आता। इसलिए इस पूरे विषय को तथ्य, ऐतिहासिक संदर्भ और राजनीतिक दावों के अलग-अलग स्तर पर देखना जरूरी है।

1959 में काबुल गए थे जवाहरलाल नेहरू

उपलब्ध ऐतिहासिक रिकॉर्ड के अनुसार तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने सितंबर 1959 में अफगानिस्तान की यात्रा की थी। नेहरू आर्काइव में 16 सितंबर 1959 की काबुल यात्रा से संबंधित दस्तावेज भी उपलब्ध हैं, जिनमें भारत-अफगानिस्तान के ऐतिहासिक संबंधों और दोनों देशों के बीच संपर्क का उल्लेख मिलता है।

कुछ प्रकाशित स्रोतों में यह दावा किया गया है कि इस यात्रा के दौरान नेहरू बाबर की मजार भी गए थे। इस यात्रा को लेकर बाद में राजनीतिक और वैचारिक बहस होती रही है।

इंदिरा गांधी की 1968 की यात्रा का उल्लेख

नेहरू की बेटी और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के 1968 के अफगानिस्तान दौरे को लेकर पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह के संस्मरणों में बाबर की मजार का उल्लेख मिलता है।

नटवर सिंह ने अपनी पुस्तक में लिखा कि इंदिरा गांधी बाबर की मजार पर कुछ समय के लिए रुकीं और सिर झुकाकर खड़ी रहीं। बाद के लेखों में इसी प्रसंग को नेहरू-गांधी परिवार की बाबर में विशेष रुचि के दावे से जोड़ा गया।

हालांकि, किसी ऐतिहासिक स्थल पर जाना अपने आप में उस व्यक्ति की राजनीतिक या वैचारिक निष्ठा का निर्णायक प्रमाण नहीं माना जा सकता।

2005 में राहुल गांधी भी पहुंचे थे बाबर की मजार

अगस्त 2005 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के अफगानिस्तान दौरे के दौरान राहुल गांधी भी उनके साथ थे। उपलब्ध रिपोर्टों और बाद में प्रकाशित सामग्री में राहुल गांधी के बाबर की मजार जाने का उल्लेख मिलता है।

2024 में राहुल गांधी की बाबर की मजार पर मौजूदगी की पुरानी तस्वीर सोशल मीडिया और राजनीतिक बहस में फिर चर्चा का विषय बनी थी। हिंदुस्तान टाइम्स ने भी इस तस्वीर और उस समय हुई राजनीतिक बयानबाजी पर रिपोर्ट प्रकाशित की थी।

क्या यह सिर्फ संयोग था या कोई विशेष संबंध?

प्रदीप सिंह ने अपने कार्यक्रम में इसी क्रम को आधार बनाकर सवाल उठाया कि नेहरू, इंदिरा गांधी और राहुल गांधी जैसे परिवार के अलग-अलग सदस्यों का बाबर की मजार तक पहुंचना क्या महज ऐतिहासिक यात्राओं का हिस्सा था या इसके पीछे कोई विशेष कारण था।

कुछ राजनीतिक और वैचारिक लेखों में इसे नेहरू-गांधी परिवार की बाबर के प्रति विशेष रुचि के रूप में प्रस्तुत किया गया है। वहीं दूसरी ओर, ऐसी यात्राओं को भारत-अफगानिस्तान के ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक संबंधों तथा काबुल के महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थलों के दौरे के संदर्भ में भी देखा जा सकता है।

महत्वपूर्ण बात यह है कि उपलब्ध सार्वजनिक स्रोतों में ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिलता, जिससे नेहरू-गांधी परिवार और बाबर के बीच किसी प्रत्यक्ष पारिवारिक संबंध की पुष्टि होती हो।

नेहरू की बाबर पर राय भी चर्चा में

इस बहस का एक दूसरा हिस्सा जवाहरलाल नेहरू की ऐतिहासिक लेखन में बाबर के चित्रण से जुड़ा है। नेहरू ने अपनी पुस्तक The Discovery of India में बाबर के व्यक्तित्व, साहित्यिक रुचि और उसके शासनकाल पर चर्चा की थी।

आलोचक नेहरू के बाबर संबंधी सकारात्मक आकलन को उनकी राजनीतिक सोच से जोड़ते हैं। दूसरी ओर, इतिहास के अध्ययन में किसी शासक के व्यक्तित्व, साहित्यिक रुचि और उसके सैन्य अभियानों का मूल्यांकन अलग-अलग संदर्भों में किया जाता है।

बाबर के अपने संस्मरण बाबरनामा में उसके सैन्य अभियानों, धार्मिक विचारों और राजनीतिक संघर्षों से संबंधित विभिन्न विवरण मिलते हैं। इसलिए बाबर के ऐतिहासिक मूल्यांकन को केवल एक कथन या एक यात्रा के आधार पर देखना उचित नहीं होगा।

बाबरी मस्जिद विवाद से भी जोड़ा जाता है मुद्दा

इस पूरे विषय को अक्सर अयोध्या और बाबरी मस्जिद विवाद से जोड़कर राजनीतिक बहस में उठाया जाता रहा है। 2024 में राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम के दौरान भी राहुल गांधी की बाबर की मजार वाली पुरानी तस्वीर को लेकर राजनीतिक बयानबाजी हुई थी।

कुछ मीडिया रिपोर्टों और राजनीतिक टिप्पणियों में यह सवाल उठाया गया कि नेहरू-गांधी परिवार के सदस्य बाबर की मजार गए, जबकि परिवार के सदस्यों की अयोध्या यात्रा को लेकर अलग-अलग दावे किए जाते रहे हैं। इन दावों को उनके राजनीतिक संदर्भ में देखना जरूरी है।

‘रहस्य’ कितना ऐतिहासिक और कितना राजनीतिक?

नेहरू-गांधी परिवार के सदस्यों द्वारा बाबर की मजार की यात्राओं का उल्लेख कई स्रोतों में मिलता है। लेकिन इन यात्राओं को किसी छिपे हुए पारिवारिक संबंध या बाबर से वंशगत रिश्ते का प्रमाण मानना अलग दावा है, जिसके लिए ठोस ऐतिहासिक प्रमाण आवश्यक होंगे।

इसलिए इस विषय में तीन बातें अलग-अलग रखना जरूरी है—

पहला: परिवार के कुछ सदस्यों की बाबर की मजार यात्रा से संबंधित ऐतिहासिक/मीडिया रिकॉर्ड मौजूद हैं।

दूसरा: इन यात्राओं की राजनीतिक और वैचारिक व्याख्या को लेकर अलग-अलग मत हैं।

तीसरा: इन यात्राओं से नेहरू-गांधी परिवार और बाबर के बीच कोई प्रत्यक्ष पारिवारिक संबंध साबित होता है—ऐसा निष्कर्ष उपलब्ध स्रोतों से नहीं निकाला जा सकता।

यही वजह है कि बाबर की मजार और नेहरू-गांधी परिवार से जुड़ा यह विषय आज भी इतिहास, राजनीति और सार्वजनिक विमर्श में चर्चा का विषय बना हुआ है।