नई दिल्ली। बढ़ती उम्र का असर आमतौर पर चेहरे की झुर्रियों और सफेद बालों से देखा जाता है, लेकिन स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि कई मामलों में दिमाग शरीर से पहले बूढ़ा होने लगता है। इससे याददाश्त, एकाग्रता और सोचने-समझने की क्षमता प्रभावित हो सकती है।
नारायणा हॉस्पिटल, गुरुग्राम के न्यूरोसर्जरी विशेषज्ञ डॉ. उत्कर्ष भगत के अनुसार, व्यक्ति की वास्तविक उम्र और दिमाग की जैविक उम्र हमेशा समान नहीं होती। कई बार मस्तिष्क की उम्र वास्तविक उम्र से अधिक हो जाती है, जिसे "ब्रेन एज गैप" कहा जाता है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, यदि दिमाग तेजी से बूढ़ा हो रहा हो तो भविष्य में अल्जाइमर, स्ट्रोक और अन्य न्यूरोलॉजिकल बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। हाल के अध्ययनों में यह भी पाया गया है कि दिमाग की उम्र और शारीरिक उम्र के बीच अधिक अंतर होने पर मानसिक क्षमताओं में गिरावट तेज हो सकती है।
डॉ. भगत ने बताया कि रोजमर्रा की कुछ आदतें दिमाग की उम्र बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इनमें लगातार तनाव में रहना, पर्याप्त नींद न लेना, अत्यधिक प्रोसेस्ड और जंक फूड का सेवन तथा सामाजिक रूप से अलग-थलग रहना प्रमुख कारण हैं।
उन्होंने कहा कि लंबे समय तक तनाव रहने से दिमाग के उस हिस्से पर असर पड़ता है जो याददाश्त और सीखने की क्षमता को नियंत्रित करता है। वहीं, खराब नींद दिमाग की मरम्मत और विषैले तत्वों को बाहर निकालने की प्राकृतिक प्रक्रिया को प्रभावित करती है।
विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि अत्यधिक प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों का सेवन और सामाजिक संपर्क की कमी मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकती है। अकेलापन और सामाजिक अलगाव को डिमेंशिया और अल्जाइमर के जोखिम से भी जोड़ा गया है।
हालांकि, डॉक्टरों का मानना है कि जीवनशैली में सुधार कर दिमाग की उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को काफी हद तक धीमा किया जा सकता है। नियमित व्यायाम, पर्याप्त नींद, मानसिक गतिविधियां, तनाव प्रबंधन और परिवार व दोस्तों के साथ सक्रिय सामाजिक संबंध दिमाग को लंबे समय तक स्वस्थ बनाए रखने में मदद कर सकते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, शरीर के साथ-साथ दिमाग की सेहत पर ध्यान देना भी उतना ही जरूरी है, क्योंकि स्वस्थ मस्तिष्क ही बेहतर जीवन गुणवत्ता और सक्रिय उम्र का आधार बनता है।