उदयपुर/नई दिल्ली: क्या हल्दीघाटी के युद्ध का इतिहास हमसे छिपाया गया? क्या पिछले कई दशकों से हमें स्कूल-कॉलेजों में जो पढ़ाया जा रहा है, वह एक सोची-समझी साजिश का हिस्सा था? यह सवाल एक बार फिर देश के राजनीतिक और ऐतिहासिक गलियारों में गूंज उठा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने उदयपुर में महाराणा प्रताप की 486वीं जयंती के अवसर पर एक बड़ा दावा करते हुए कहा कि हल्दीघाटी के युद्ध में अकबर की जीत नहीं, बल्कि महाराणा प्रताप की विजय हुई थी।
"दुनिया में कहीं अकबर की जयंती नहीं मनाई जाती" - मोहन भागवत भागवत ने इतिहासकारों पर तथ्यों से छेड़छाड़ का आरोप लगाते हुए कहा, "आज हम महाराणा प्रताप की जयंती मना रहे हैं, लेकिन क्या दुनिया में कहीं अकबर की जयंती मनाई जाती है? तो फिर जीता कौन?" उन्होंने आगे कहा कि सैन्य और शस्त्रों के मामले में भले ही अकबर का पलड़ा भारी था, लेकिन महाराणा प्रताप के पास आत्मबल और धर्म-संस्कृति की रक्षा का संकल्प था।
ऐतिहासिक साक्ष्य और मुगलों का आत्मसमर्पण ट्रांसक्रिप्ट के अनुसार, इतिहास के पन्नों को पलटें तो 1572 से 1576 के बीच अकबर ने महाराणा प्रताप को झुकाने के लिए जलाल खान, राजा मानसिंह, राजा भगवंत दास और टोडरमल जैसे चार बड़े दूत भेजे, लेकिन सब असफल रहे। इसके बाद जून 1576 में हल्दीघाटी का ऐतिहासिक युद्ध शुरू हुआ।
मुगल सेना की संख्या जहाँ 80,000 थी, वहीं मेवाड़ी सेना के पास मात्र 20,000 सैनिक थे। इसके बावजूद मुगल इतिहासकार अब्दुल कादिर बदायूंनी के लेख बताते हैं कि युद्ध में मुगल सेना की अग्रिम टुकड़ी बुरी तरह हार गई थी और उबड़-खाबड़ रास्तों में बिखर गई थी। युद्ध के बाद अकबर ने महाराणा प्रताप को न पकड़ पाने की नाराजगी में मानसिंह और आसफ खान को अपने दरबार से कुछ समय के लिए दूर कर डिमोट (पदावनत) कर दिया था।
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1582 में दिवेर के युद्ध में महाराणा प्रताप ने मुगलों को निर्णायक रूप से हराया।
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भारत के अनकहे इतिहास को उजागर करने वाले मशहूर इतिहासकार रघुहरी डालमिया ने अपनी पुस्तक 'The Untold History of India: Invaders' Cruelty and Conspiracy' में इस युद्ध को लेकर कई बड़े खुलासे किए हैं। डालमिया लिखते हैं कि हल्दीघाटी के युद्ध में मुगल सेना को अपने से लगभग चार गुना छोटी मेवाड़ी सेना के हाथों बुरी तरह पराजित होना पड़ा था। उन्होंने इतिहास पर एक तार्किक सवाल उठाते हुए लिखा है कि अगर अकबर यह युद्ध जीत गया था, तो उसे उसी साल (नवंबर 1576 में) एक और विशाल सेना लेकर दोबारा गोगुंदा पर आक्रमण करने की क्या ज़रूरत पड़ी? इसके बाद मार्च 1577 में मानसिंह और आसिफ खान गोगुंदा में फंस गए, जहाँ उनके सैकड़ों सैनिक भूख और बीमारी से मारे गए। मुगलों की इसी विफलता के कारण अकबर ने उन्हें डिमोट (पदावनत) कर दिया था।
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समकालीन मुगल इतिहासकार बदायूंनी और ब्रिटिश इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड (जिन्होंने हल्दीघाटी को 'मेवाड़ का थर्मोपाइल' कहा) के ऐतिहासिक साक्ष्य मुगलों की विफलता की पुष्टि करते हैं।
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अकबर के ही दरबारी कवि दुरसा आढ़ा ने अकबर के सामने महाराणा प्रताप की वीरता में 76 सोरठ (दोहे) लिखे थे, जिसमें उन्होंने कहा था कि सुख के लिए अन्य राजा भले ही अकबर के गुलाम हो गए हों, लेकिन सिंह के समान महाराणा प्रताप कभी पराधीन नहीं हुए।
मेवाड़ के 77वें वंशज लक्ष्यराज सिंह का बड़ा बयान: बदला जाए सिलेबस इस पूरे विवाद पर महाराणा प्रताप के वंशज और हाउस ऑफ मेवाड़ के 77वें कस्टोडियन लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ ने खुलकर संघ प्रमुख के बयान का समर्थन किया है। उन्होंने कहा, "हम लंबे समय से गुहार लगा रहे हैं कि इतिहास के सही तथ्यों को सामने लाया जाए। अब समय आ गया है कि सरकार से मांग की जाए कि स्कूली पाठ्यक्रम (Syllabus) को बदला जाए ताकि आने वाली पीढ़ियां देश का वास्तविक और गौरवशाली इतिहास पढ़ सकें।"