सिवनी मालवा केस: 14 गौ रक्षकों को उम्रकैद के फैसले पर सुलग रहा है देश; कोर्ट के निर्णय और पुलिसिया सिस्टम पर उठे 5 बड़े सवाल
नर्मदापुरम/भोपाल: मध्य प्रदेश के नर्मदापुरम जिला न्यायालय (सेशन कोर्ट) द्वारा 14 गौ रक्षकों को एक साथ आजीवन कारावास (उम्रकैद) की सजा सुनाए जाने के बाद देश का सामाजिक और न्यायिक माहौल गरमा गया है। 2 अगस्त 2022 को सिवनी मालवा क्षेत्र में गौवंश की तस्करी कर रहे एक ट्रक को रोकने के दौरान हुई झड़प और उसके बाद एक व्यक्ति की मौत के इस मामले में जज तबस्सुम खान के फैसले पर अब देशव्यापी 'न्यायिक संग्राम' छिड़ गया है।
सोशल मीडिया से लेकर कानूनी गलियारों तक एक ही सवाल गूंज रहा है—क्या निस्वार्थ भाव से गौ सेवा करने वाले 14 गरीब परिवारों को जेल की सलाखों के पीछे सड़ने के लिए छोड़ दिया जाएगा?
क्या था पूरा मामला? (घटनाक्रम 2022)
2 अगस्त 2022 की रात, मध्य प्रदेश से भारी मात्रा में क्रूरतापूर्वक गौवंश भरकर एक गाड़ी महाराष्ट्र की सीमा की तरफ बढ़ रही थी। सिवनी मालवा के पास स्थानीय ग्रामीणों और गौ सेवकों ने इस संदिग्ध ट्रक को रोकने का प्रयास किया। गाड़ी में नजीर अहमद, शेख लाला और शेख मस्ताक नामक तीन लोग सवार थे।
आरोप है कि गौ तस्करों ने नाका तोड़कर भागने की कोशिश की, जिसे रोकने के लिए गौ रक्षकों ने गाड़ी पर लाठियां चलाईं। इस दौरान दोनों पक्षों में हिंसक झड़प हुई, जिसमें तीनों तस्कर घायल हो गए। घटना के कुछ दिनों बाद, घायल नजीर अहमद की इलाज के दौरान मौत हो गई। पुलिस ने शुरुआत में अज्ञात लोगों के खिलाफ दंगा करने (Riot) और हत्या (IPC 302/307) जैसी संगीन धाराओं में मामला दर्ज किया और बाद में जांच के आधार पर इन 14 स्थानीय युवकों को आरोपी बनाया।
कानूनी धरातल पर क्यों कमजोर दिख रहा है यह फैसला?
देश के प्रतिष्ठित विधिक विशेषज्ञों और सर्वोच्च न्यायालय के वकीलों ने कोर्ट के इस फैसले की कानूनी कमियों को उजागर किया है:
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1. पोस्टमॉर्टम और मेडिकल रिपोर्ट का विरोधाभास: मेडिकल एक्सपर्ट्स की रिपोर्ट (पैरा 22) के मुताबिक, मृतक नजीर अहमद की मौत मारपीट की चोटों से नहीं, बल्कि गले की सांस नली में उल्टी (Vomit) फंसने के कारण दम घुटने (Asphyxiation) से हुई थी।
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2. 'विशिष्ट कृत्य' सिद्ध न होना: फैसले के पैरा 93-94 में अदालत ने स्वयं स्वीकार किया है कि सभी आरोपियों का 'विशिष्ट कृत्य' (यानी किसने जानलेवा वार किया) स्पष्ट रूप से साबित नहीं हुआ है। इसके बावजूद धारा 149 (कॉमन ऑब्जेक्ट) का अत्यधिक कठोर इस्तेमाल करके पूरी भीड़ को एक ही तराजू में तौल दिया गया।
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3. हथियारों का अन-एग्जामिंड होना: पुलिस द्वारा जब्त लाठियों और डंडों का किसी भी फॉरेंसिक या स्वतंत्र डॉक्टर से परीक्षण नहीं कराया गया, जिससे यह साबित हो सके कि उन्हीं हथियारों से चोटें आईं।
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4. केवल संभावना के आधार पर सजा: सर्वोच्च न्यायालय का सिद्धांत कहता है कि सजा 'बियॉन्ड रीज़नेबल डाउट' (संदेह से परे) होनी चाहिए, लेकिन यहाँ केवल 'रिमोट पॉसिबिलिटी' (संभावना इंगित होने) पर उम्रकैद दे दी गई।
"आतंकियों को वकील मिल जाते हैं, गौ रक्षकों के परिवार अनाथ छोड़ दिए गए"
डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म 'आयोग' के वरिष्ठ पत्रकार सौरभ कुमार ने तीखा सवाल उठाते हुए कहा, "इस देश का दुर्भाग्य देखिए कि देश के टुकड़े करने की कसम खाने वाले आतंकियों और दंगाइयों को बचाने के लिए कपिल सिब्बल जैसे महंगे वकील रात के 2 बजे सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खुलवा लेते हैं। वहीं, भारत माता की संस्कृति और गायों को बचाने वाले 14 तगाड़ी ढोने वाले, गरीब मजदूरों की जिंदगी को सूली पर टांग दिया गया और 4 दिन तक किसी मुख्यधारा की मीडिया ने सवाल तक नहीं पूछा।"
सजा पाने वाले सभी युवक बेहद गरीब पृष्ठभूमि से हैं। पीड़ित परिवार के सदस्य जितेंद्र ने रोते हुए बताया कि इनमें से दो सगे भाइयों के जाने से घर में बुजुर्ग पिता अकेले रह गए हैं, जबकि दो अन्य गौ रक्षकों की पत्नियां इस वक्त गर्भवती (प्रेग्नेंट) हैं। घर में चूल्हा जलना बंद हो गया है।
मध्य प्रदेश की मोहन यादव सरकार पर उठे गंभीर सवाल
इस पूरे घटनाक्रम ने मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार को भी कटघरे में खड़ा कर दिया है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव खुद को यदुवंशी बताते हैं और मंचों से घोषणा करते हैं कि मध्य प्रदेश में गौ हत्या और अवैध परिवहन पर पूर्ण प्रतिबंध है।
ऐसे में जनमानस पूछ रहा है:
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जब राज्य में गौ तस्करी प्रतिबंधित है, तो पुलिस प्रशासन इस अवैध परिवहन को रोकने में नाकाम क्यों रहता है?
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हर बार तस्करों को पकड़ने के लिए निहत्थे ग्रामीणों और सामाजिक संगठनों को अपनी जान दांव पर लगाकर आगे क्यों आना पड़ता है?
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जब यह ट्रायल कोर्ट में केस चल रहा था, तब सरकारी वकील (Prosecution) क्या कर रहे थे?
हाई कोर्ट में मुफ़्त पैरवी करेंगे सुप्रीम कोर्ट के दिग्गज वकील
सुदर्शन न्यूज़ के मंच पर सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता मधु मुकुल त्रिपाठी, विनीत जिंदल और संदीप मिश्रा ने इस पीड़ित परिवारों की मदद के लिए हाथ आगे बढ़ाया है। वकीलों के इस पैनल ने घोषणा की है कि वे इन 14 गरीब गौ रक्षकों से ₹1 भी फीस नहीं लेंगे। ट्रायल कोर्ट के रिकॉर्ड्स मंगाकर हाई कोर्ट (उच्च न्यायालय) के लिए मुफ्त ड्राफ्टिंग और पैरवी की जाएगी। कानूनी विशेषज्ञों को पूरा भरोसा है कि ऊपरी अदालत में यह त्रुटिपूर्ण फैसला पहली ही सुनवाई में धराशायी हो जाएगा।