परोपकार का पैमाना बांटी गई दौलत नहीं, संवारे गए जीवन: नीता अंबानी का संदेश— 'मदद ऐसी हो कि एक दिन दान की जरूरत ही न रहे'
मुंबई: मुंबई के एक मध्यमवर्गीय परिवार से निकलकर रिलायंस फाउंडेशन की चेयरपर्सन बनने तक नीता अंबानी का जीवन सेवा और संवेदनाओं की अनूठी मिसाल रहा है। अपने व्यक्तिगत अनुभवों और गांधीवादी मूल्यों को साझा करते हुए उन्होंने समाज में स्थायी बदलाव लाने के लिए एक मजबूत विजन सामने रखा है।
नीता अंबानी का मानना है कि परोपकार का सर्वोच्च उद्देश्य यह होना चाहिए कि एक दिन समाज को दान की जरूरत ही न रह जाए। सिर्फ तात्कालिक मदद काफी नहीं होती; हमें ऐसे मजबूत संस्थान खड़े करने होंगे जो लोगों को अवसर दें और स्थायी बदलाव लाएं। यूनिवर्सिटी, अस्पताल, स्कूल और रिसर्च लैब किसी भी समाज के भविष्य की वास्तविक नींव होते हैं।
उन्होंने कहा कि दुनिया में संसाधनों की कोई कमी नहीं है, फिर भी करोड़ों लोग बुनियादी सुविधाओं, शिक्षा, स्वास्थ्य और सम्मानजनक रोजगार से वंचित हैं। देश के दूरदराज इलाकों में असाधारण प्रतिभा मौजूद है—चाहे वे किसान हों, कारीगर हों, खिलाड़ी या शिक्षक। रिलायंस फाउंडेशन के जरिए शिक्षा, स्वास्थ्य, कला, खेल और ग्रामीण विकास जैसी पहलों के पीछे यही सोच रही है कि स्वाभिमानी लोगों को दान नहीं, बल्कि अपनी क्षमता साबित करने का अवसर चाहिए।
नीता अंबानी ने जोर देकर कहा कि परोपकार की सफलता इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि हमने कितना धन बांटा, बल्कि इससे आंकी जानी चाहिए कि हमने कितने जीवन संवारे और कितना बेहतर भविष्य गढ़ा।